वनक श्रृंगार

वनक श्रृंगार
श्वेत हिरण सन सरपट दौड़ैये
दिन दुर्निवार
तैयो कुसुमक कली-कली करैये
वनक श्रृंगार
बहय पछवा आ कि पुरबा
बेमाय हमरे टहकत
दरकत हमरे ठोर
जेना पड़ल हो खेत बीच दरार
साझी दलान बटल
पड़ल पुरान आंगनमे नव देबाल
नई बनत आब सांगह
हमर घरक….
ई टूटल हथिसार
सागर मोनमे आस्ते-आस्ते
उतरैये डगमग करैत नाह
हाथ नै पतवार
आंखिमे जंगलक अन्हार
सगरो इजोत ता’ बिदा होइत छी,
खूजल अइ छोटछीन खिडकी
मुदा अपन घरक निमुन्न अइ केवाड़
के मारल गेल, पकड़ल के गेल
से कह’ आ ने कह’
भोरक अखबार
मुदा सेनुरसँ ढौरल अइ हमर चिनवार
कोइली कुहुकि-कुहुकि कहत
कखन हैत भोर आ
कत’-कत’ अइ ऊँच पहाड़
कारी सिलेट पर
लिखल अइ बाल-आखर
जेना सड़क पर सगरो
छिड़िआएल हो सिंगरहार
(मूल अग्नि पुष्प)
अग्निपुष्पक “वनक शृंगार”क हिन्दी अनुवाद ( साहित्य अकादमी से सम्मानित प्रोफेसर भीमनाथ झा द्वारा)
वन का शृंगार
श्वेत हिरण सा दौड़ रहा है सरपट
दिन दुर्निवार
फिर भी कुसुमों की कलियां करती हैं
वन का सिंगार
जो भी बहे
पुरबैया या पछिया
टहकेंगी दर्द से बिवाइयाँ
अपने ही पैरों की
दरकेंगे अपने ही होंठ
मानो खेतों में पड़ी हों दरार
बँट गया साझा दालान
खड़ी हो गई पुराने आंगन में
नई एक दीबार
अब नहीं बनेगी ‘सांगह’ अपने घर की
टूटी हुई यह हथसार
अपने इस सागर-मन में
धीरे-से उतरती है डगमगाती डोंगी
हाथ में नहीं पतवार
आँखों में निविड़ वन का अंधेरा
उजाला है हर ओर
तभी विदा होता हूँ मैं,
छोटी-सी खिड़की है खुली हुई
मगर खुद के घर का दरबाजा है बन्द पड़ा
कौन गया मारा
पकड़ा गया कौन है
कहे, न कहे सो
सुवह का अखबार
मगर सेनुर से पुता हुआ है
मेरा ‘चिनवार’
कोकिला की कूक तो कहेगी ही
कब होगी भोर
और कहाँ-कहाँ है ऊँचा पहाड़
काली स्लेट पर
लिखा है बाल-आखर
जैसे सड़क पर बिखरा हुआ हो हरसिंगार
भीमनाथ झा

Contextualising the ‘social’: Reading Bhimnath Babu and Milton

Contextualising the ‘social’: Reading Bhimnath Babu and Milton
It is argued that Milton’s Paradise Lost used literature as a medium of expression, Milton intentionally wrote Paradise Lost as a political poem, in which, by re-writing the Biblical story of the Creation, the fall of Satan and the fall of Adam and Eve, he created a strong political subtext which reflected and resonated with the social and political panorama of England of his time. In Maithili literature, village as a lost paradise is a recurring theme. Is it just a loss of a social-cultural or that अनभुआर होइत गाम has a larger political ramification too laddened with literary allegories? Why writings in vernacular should be slotted for a restrictive, compulsive social examination only? Below is the translation of a hugely respected, sahitya akademi awardee’s poem and original in Maithili.
भीमनाथ झा
Our lost paradise (my unfamiliar village)
On the village’s Maricha farmlands
Towards Navipokhari pond’s edge
That lay towards the Jhaukathi orchards
Towards Sacred Bankuba baba’s old tree
Be it biting cold or tiring humidity
In pouring rain or in gentle spring breeze
The herdsman grazing his buffalo since before dawn
Sitting on its back or caressing its backbone
Would sing his happy songs in his unique style.
He would stop for awhile
Let the cattle free to graze around
And melodiously sing songs of love
Then stop again
Herding the goats & sheep
He would sing out the poet’s signature
And stop again.
A grown up with the hoe on his shoulder
And/or an elderly with spades tucked away
Would sing of Alha-Udal or Laila-Majnu
Or a gypsy’s lullaby or a poem by Dinabhdra
Or a story from the epic Rai Ranpal.
When I would hear this with my own ears
And I am telling you the truth
I would feel that
Mother nature has picked up the tunes herself and joined in.
From every dalaan (verndah) or khalihan (barn)
Be it the sikki grass mat or the collage rag
the roughest or the torn ones
All the mats would resonate with the
Repeated sounds of the students
Memorizing their lesson through rote verbalisation
Whenever these sounds would reach my ears, morning or evening
To tell you the truth
I would feel Mother Saraswati (Goddess)
Is blessing the kids foreheads
with her personal caresses.
At every door or any roundabout
At the Goddess’s temple or public platform
Be it the school grounds
Or Khadi Bhandar’s corridoors
Or the village markets
At the hospital
Or the youth organisation office
By the time of evening
On some mat or at any pleasure place
All the villagers
From all over
Far and near
All kinds, all types
Grandkids to grandfathers
Somewhere strongly presenting their thoughts
Or somewhere purely gossiping with force
Somewhere in pensive mood
Or somewhere laughter would boom
Somewhere there would be deep discussion
Somewhere poetry and its analysis
The swelling mirth and laughter of
Living in the moment
When I would see my community and people
To tell you the truth
I would feel
As if life itself gently engulfs the village
Like falling Parijat flowers all across.
My village resonated with
the emerging sounds of infants
merging with the immortal songs of poets Vidyapati-Madhup_Ravindra
When I drank of these
Truth be told
I would feel
Ma Sharda (Goddess) has herself immersed in the tunes.
In my village
Whosoever I saw
Whomsoever I spoke with
Be it Gonu baba or Jayanandan baba
A young Kisnu babu or Baldev babu
Bhullu babu or Kullu babu
Jibcha or Kisunma
Everone had empathy
Everywhere there was loving feel
Everywhere a maternal love
Wherever you went, you got the same
Truth be told
That emotion and empathy
Felt like everyone opened their doors
Lovingly for me.
My village is the same today
My house, household, my place is the same
As is everyone else’s home, aangan (courtyard)
The same doors, same dalaan (verandah)
Even today one can hear the songs in the morning and evening
Coming from the Maricha farmlands,
The Bankuna baba’s side
Even today resonates the students rote learning
From across the barns
Even today they gather grandchildren and grandfathers
(some leaping, some reluctant)
Even today one can hear from many homes
The songs of Vidyapati-Madhup
Even today many people as for my well-being,
But truth be told
I don’t find in those voices
Now any free flowing simplicity
I search deep within the hearts
of folks I meet
But the lotus has withered.
Even today, the village booms with the sounds of drums
Of rhythmic beats
But now its tone seems faint and weak
Colors are still part of Holi today
But the faces of people seem pale and colorless
Spring visits our village even today
But people keep their faces wrapped up
Courteous folks still ask about your well-being
But their wandering eyes give them away
The faces seem familiar no doubt
But my village seems unfamiliar today.
IIअपन गाम अनभुआरII
अपन गामक मरिचा बाध
कि झौआकोठि गाछी दिस
नवीपोखरिक मोहार
कि बनकुबा बबाक थान दिस
जाड़-ठार पड़ौ कि होउ गुमकी-झरकी
उमड़ि अबौ मेघ कि रमकौ वासन्ती सिहकी
अहलभोरेसँ पसर चरबैत
मासिक पीठपर बैसल कि ओकर रीढ़क चमड़ी बकुटने लम्बमान भेल चरबाह
अलबेला स्वरमे संगीत-संधान करै छल ।
कने थमिक’-
मायाजालकें चर’ ले’ अनेरे छोड़ि दैत
आ मचलैत किशोर दल उन्मुक्त तान टेरै छल
फेर कने थमिक-
छागर-पाठी हँकैत टेल्ह सभ
अनायासे कोनो भनिता धs लइ छल ।
फेर कने थमिक-
कोनो प्रौढ़
धयने कान्हपर कोदारि आ कोनो बूढ़
छिट्टा-खुरपीकें माथपर उघने चलैत
आल्हा-ऊदल कि लैला-मजनू
कि लोरिक बनिजारा कि दीनाभद्री
कि राय रनपाल-महागाथाक टुकड़ी अलापै छल ।
अपन कानसँ ई सभ सुनैत रही जहिया
तँ सत्ते कहै छी
बुझि पड़य हमरा
साक्षात् प्रकृति जेना अपनहिसँ भास उठा लेने होथि !
अपन गामक ओहि दलानसँ कि ओहि खरिहानसँ सितलपाटीपर कि खिनहरि-चटगुन्नीपर
खजुरपटियापर कि फटलाहा सपटापर
घोद-मोद बैसल चटिया सभक
खाँत रटैत कि ककहरा घोखैत
उठैत अनघोल
जहिया साँझ-प्रात कानमे पड़ैत रहय
तं सत्ते कहै छी
बुझि पड़य हमरा
ममतामयी सरस्वती नेना सभक चानि
जेना अपनहिसँ सोहरा रहलि छथिन !
अपन गामक
ओहि दरबज्जापर कि ओहि गोलापर
भगवती थानक ओहि चबुतरापर
कि स्कूलक ओहि मैदान मे
खादी भंडारक ओसारपर
कि चौकक दोकानमे
अस्पतालक आगाॅमे
कि युवक संघक अङनैमे
तेसर पहर दिन झुकिते
सतरंजक स’हपर कि कोनो गुलछर्राक तऽहपर
गाम भरिक सभ फरिक
सभ तूरक
सभ भाँतिक, सभ कांतिक
नातिसँ लऽकऽ नाना धरि
कतहु क्यों अपनी बात पर जोर दैत
तँ कतहु खाँटी गप्पक बोर दैत
कतहु क्यों एकान्ती करैत
तँ कतहुसँ ठहक्का उठैत
कतहु विचार-चिन्तन चलैत
तँ कतहु काव्यचर्चा होइत
उमडैत हास-उल्लासक मानसरोवरमे
अवगाहन करैत
अपन समाज के देखैत रही जहिया
तँ सत्ते कहै छी
बुझि पड़य हमरा
जेना गाम भरिक आबेशक गाछक सिङरहार
तुबि-तुबिकऽ झहरै छल !
अपन गाममे
ड्योढ़ीटाटक भीतरसँ अबैत
ललना लोकनिक कंठ-मधुमेह घुलल
विद्यापति-मधुप-रवीन्द्रक गीतामृत
पीबैत रही जहिया
तँ सत्ते कहै छी
बुझि पड़य हमरा
सुरमे जेना शारदा अपनहिँ समा गेल होथि !
अपन गाममे
जनिका नजरि पड़य
जनिकेसंगप्प होअय-
रहथु गोनू बाबा कि जयनन्दन बाबा
जवान किसून बाबू कि बलदेव बाबू
भुल्लू बाबू कि कुल्लू बाबू
जिबछा कि किसुनमा…
सभमे आपकता
सभ ठाँ सिनेह-भाव
सर्वत्र ममता…
जेम्हरे जाइ तिम्हरे
जे भेटय सैह
सत्ते कहै छी
ओहि उद्गार-आपकतामे
बुझि पड़य हमरा जेना ओलोकनि सिनेह-पट
हमरा लेल खोलि देथि !
आइयो अपन गाम अछि वैह
अपन डीह-डाबर अपन धाम अछि वैह
ओहिना सभक घर-आङन
ओहिना दरबज्जा, ओहिना दलान
आइयो लगैत अछि मरिचासँ
बनकूबा बबाक थानसँ
ओहनाहे स्वर-संधान भोर-साँझ
आइयो गुंजैत अछि खरिहानपर
चटिया सभक ककहरा-पाठ
आइयो भगवती थानमे
जुटैत अछि नानासँ नाति धरि
(क्यो छरपैत तँ क्यो ठेंगा टेकैत)
आइयो अबैत अछि
कतोक आङनसँ
विद्यापति-मधुपक गुंजन
आइयो कतेको गोटे हमरासँ पुछैत अछि
मुदा सत्ते कहै छी आइ एहि वाणीमे
भेटैए कत्तौ नहि कनियों मुक्त हास आब
दूर-दूर धरि हृदय-सरितामे तकैत छी
गोट-गोट लोकक
-कमल मुदा मौलायल !
आइयो अपन गाममे
ढोलपर, डम्फापर थाप तँ पड़िते अछि
मुदा आबे ओकर स्वर
जेना बिरस-बिरस बुझाइए !
रंग तँ आइयो खेलायले जाइत अछि
आब मुदा लोकक मुँह
अरे ! बेदरंग भऽ जाइ छैक !
वसन्त अपन गाममे तँ आइयो करैत अछि
मुदा सलगासँ मुँह लोक झपनहिँ रहैत अछि !
कुशल-क्षेम पुछनिहार
आइयो भेटैत अछि
मुद्रा आँख के पुतरी ओकर कोनादन नचैत छैक !
लोकक चेहरा तँ चीन्हल बुझि पड़ैए
आइ अपन गामे मुदा अनभुआर लगैत अछि !
प्रो. भीमनाथ झा
Author: Dr. Savita Jha
Translator: Arvind Jha

CEACOM – Citizen Economic Advisory Council For Mithila

Centre for Studies of Tradition & Systems (CSTS) in collaboration with Mithila Angel Network is geared towards forming Citizen’s Economic Advisory Council for Mithila (CEACOM) in light of recent pronouncements made by minister Industries, Government of Bihar of plans of forming a SEZ ( Special Economic Zone) for Mithila region. We anticipate that formation of SEZ will be a game changer along with other developments happening in that region. CEACOM will act like an agent of economic-social-cultural change platform/ advocacy group for Mithila.

The Citizen’s Economic Advisory Council for Mithila would comprise of senior and respected citizens, experts in their own field, who have come together to collaborate with policy makers, administrators and governments and work out programs of change required to turn Mithila economy into a growing, positive new direction.

The Council would consist of experts from Agriculture, Finance & Banking, Health, Art, Corporate, Education, Administration, Legal, Language and Literature and Management professions with proven multi-decade experience in corporate, academics, bureaucracy amongst others. Each council member will be from Mithila- including some from the districts of Madhubani, Darbhanga, Samastipur and Muzaffarpur. The idea is that they will be able to mobilize the larger community for crowd-funding and acceptance of ideas/policies through their leadership and influence.

The aim of the Council would be to draw up a blueprint for nomination of these four districts – Madhubani, Darbhanga, Samastipur and Muzaffarpur as SEZ by the central and state government. The Council members will build a secondary community with sector specific experts and work out the liaison needed with Govt of India, Govt of Bihar, District administrations, Deptts concerned and Industrialists and Corporate leaders to build momentum for investments, movement of knowledge industries and policy synchronization. They will ensure that the three districts are not only nominated but the required investments to build the infrastructure, ecosystem, talent development, attracting the diaspora back, brand building and buzz building is done within the community and the diaspora.

The council will work out sector specific roadmaps – real estate development & financing, IT/ITES capacity and capability building, health city creation around Darbhanga AIIMS, Educational infrastructure and ecosystem to support test-preparation, world class university etc, agriculture supply chains and infra creation for the same, internet commerce and e marketplaces economy amongst others.

The council will be selected by a committee.

We seek your advice, guidance, support and participation. Kindly fill up this form using this link:

or write to us:

Mithila Angel Network
Painting: Bandna Singh


एकवस्त्राक परम्परा

शरीरक रक्षाक लेल वस्त्र महत्त्वपूर्ण वस्तु थिक। एकरा अलंकारक रूपमे सेहो मानल जाइत अछि। बाहरी आक्रमण सँ रक्षाक संगहि लज्जानिवारण सेहो होइत अछि. :-
वस्त्रेण त्रायते लज्जां, वस्त्रेण त्रायते त्वघम् ॥ – कालिकापुराण ।
अर्थात् वस्त्र द्वारा लज्जा एवं पाप सँ रक्षा होइत छैक। एकरा स्वच्छ राखब परम आवश्यक | मलिन वा बासि वस्त्र सँ रोग उत्पन्न होइछ –कदापि न जनैः सद्भिः धार्य मलिनमम्बरम् ॥ — भावप्रकाश (आयुर्वेद)।
अर्थात सभ्य व्यक्ति कदापि मलिन वस्त्र नहि पहिरथि ।

पूर्वकाल मे वनवासी सभ वस्त्रक अभाव में वल्कल ( गाछम छाल, केरा भोजपत्र आदिक छाल) पहिरैत छल — ‘चचाल बाला स्तनभिन्नवल्कला’- कुमारसम्भव- 5,84 ( किशोरी पार्वती तेज सँ चलि देलनि, हुनक स्तनक भार सँ वल्कल फाटि गेलनि)। एहिना कण्वपुत्री शकुन्तला वल्कल सँ सुन्दर लगैत छलीह | गाम ओ नगरक लोक वस्त्र पहिरैत छल आ धनवान सभ मलमल वा रेशमी वस्त्र धारण करैत छल.-
“वधूदुकूलं कलहंसलक्षणम्” – कुमारसम्भव- 5.67 वधू पार्वतीक दुकूल (महीन वस्त्र) हंसक छाप सँ युक्त छल | पूजापाठ काल मे धौतवस्त्रक उपयोग होइछ अपन खिचल वा सम्बन्धीक खीचल वस्त्रे उपयोग मे आनी | धोबीक घोल वस्त्र सँ पूजा नहि करी –
अधौतेन च वस्त्रेण नित्यनैमित्तिकी क्रियाम् | कुर्वन् फलंम चाप्नोति, दत्तं भवति निष्फलम् ॥
विन धल वस्त्र सँ नित्यनैमित्तिक क्रियाक फल नहि प्राप्त हो, देलो दान निष्फल भए जाए|
विशेष कर्मक (विवाह, उपनयन आदिक) काल मे नवीन वस्त्र धारण करी । सीयल, जरल आ अनकर वस्त्र पहिरि कोनो शास्त्र विहित कर्म (यज्ञ, पूजा, पाक, भोजन आदि) नहि करी न स्यूतेन न दग्धेन पारक्येण विशेषतः|
मूषिकोत्कीर्णजीर्णेन कर्म कुर्याद विचक्षणः || महाभारत |

एहिना मूसक कुतरल वा बहुत पुरान जर्जर वस्त्र पहिरि कोनो कर्म नहि करी। कर्मकाल में कुर्ता, कमीज वा ब्लाउज नहि पहिरी —
– ‘न स्यात् कर्मणि कचुकी – शब्दकल्पद्रुम | ( कर्मकाल मे कंचुक (कुर्ता आदि) धारण नहि करी )।
‘स्नात्वैव वाससी धौते अक्लिन्ने परिचायच याज्ञवल्कय

स्नान कर स्वच्छ इवस्त्र बिनु भीजल पहिरि, कर्म करी । तें धोती ओ तौनी राखब आवश्यक। किन्तु यदि एके वस्त्र धारणक प्रतिज्ञा हो, वा एके टा वस्त्र हो तँ ओकरे अगिला भाग सँ ऊपरो धारण कर ली एंक चेद् वासो भवति तस्य उत्तरार्थेन प्रच्छाद‌यति – ( आह्निकतत्व, रघुनन्दन )
तैं भोजन काल मे तौनीक अभाव में अधधोतिया कए लैत छथि। स्त्री अखण्ड वस्त्र धारण करैत छथि । अर्थात् एके टा साड़ी के पएर सँ माँथ धरि झपैत छथि। ई परम्परा प्राचीन काल सँ आइ धरि विद्यमान अछि आन देशक लोक डाण मे घघरा ओ देह मे चोली पहिरैत अछि। मिथिलों में कुमारिक लेल दू टा वस्त्र घघरी आ केचुआ (चोली) विहित अछि । मुदा विवाहिता एके वस्त्र सँ वेष्टित रहैत छथि ।
सीता एकवस्त्रा छलीह —-
पीतेनैकेन संवितां क्लिष्टेनोत्तमवाससा | सपंकामनलंकारा विपद्मामिव पद्मिनीम् ॥
– वाल्मीकि रामायण, सुन्दरकाण्ड, सर्ग-15

अशोकवाटिका में हनुमानजी सीता केँ एहि रूप मे देखलनि पीयर रंगक एकमात्र मलिन मुद्दा उत्तम वस्त्र पहिरने छलीह, धुरिऐल, असज्जित आ कमल सँ रहित कमलिनी जकाँ लगैत ‘ छलीह। साड़ीक पाढ़ि ढोंढ़ी लग बान्हल रहए- “दशा नाभौ प्रयोजयेत् प्रचेता | साड़ीक उपरका भाग के वाम भाग दए पीठ पर होइत माँथ पर चढ़ाबी —-
वामे पृष्ठे तथा नाभौ कक्षत्रयमुदाहृतम्
एभि: कक्षैः परीधन्ते यो विप्रः स शुचिः स्मृतः ॥
– भाव प्रकाश
आइ- काल्हि जिट में दहिना सँ वामा दिस आँचर रखैत छथि जे शास्त्र विरुद्ध थिक।

ई एकवस्त्राक परम्परा त्यागमूलक ओ शुचिता प्रयुक्त थिक । यद्धपि वस्त्रयुगलक उल्लेख सेहो भेटैत अधि—- हला शकुन्तले! अवसितमण्डनासि | परिधत्स्व साम्प्रतं श्रौमयुगलम्” अभिवानशाकुन्तल, चतुर्थ अंक अर्थात् हए शकुन्तला ! गहना पहिराओल गेलीह, आब ई दुइ रेमशमी कपड़ा पहिरह।मुदा ई विशेष मांगलिक अवसरक सजावट थिक | वस्तुतः एकवसना व्रत थिक जेकर सदा निर्वाह होइत रहल अछि । विशेष जाड़ मे तौनी ओढब जकाँ विशेष अवसर पर प्रावारक (दुपट्टा) ओढल जाइत रहल अछि।
गतशताब्दीक उत्तरार्ध मे पाश्चात्य प्रभावसँ साया आ ब्लाउज आएल, क्यो क्यो पहिरए लागल। बाद मे सब अपनओलक मुद्दा, पाकादि शास्त्रीय कार्य में ब्लाउज हटाइये लैते छलीह। एकर बठैत क्रमकें देखि महामहिमोपाध्याय पं० कृष्णमाधव झा व्यवस्थापत्र देलथिन जे प्रतिदिन खीचिकए सुखाओल ब्लाउज पहिरि मानस कए सकैत छथि । तहिया सँ ब्लाउज सर्वसामान्य भए गेल, मुदा ओ आँचरक स्थान नहि लेलक। एके साड़ी डॉर सँ माँथ होइत आँचर बनल अछि । अर्थात् जेहो ब्लाउज साया पहिरैत छथि सेहो एक अखण्डवस्त्र (साड़ी)धारण करिते छथि। जतर पूर्वकाल मे बीस हाथक साड़ी में महिला लपटल रहैत छलीह, दोसर बास्त्र नहि पहिरैत छलीह ततहि आई दस हाथक साड़ी ओहिना पहिरैत छथि ।

जखन पातर साड़ी अएलै त तकर तर मे पर्दाक लेल टुकरा लेल जाए लगलैक ओ ऑचरक् तर मे ब्लाउज अएलै जे सर्वप्रचलित अछि ओ आवश्यको । परन्तु आँचरक स्थान मे ओढ़नी एकवात्रताक विरुद्ध भेने त्याज्ये थिक | आँचर पर सँ ओढ़नी ओढ़ब सएह उचित थिक ।


बंगट गवैया: मिथिला का एक अचीन्हा जीनियस

पिछले दिनों महिषी की एक विलक्षण विभूति का अवसान हो गया। उनका नाम ताराचरण मिश्र था लेकिन सदा से सब उन्हें बंगट गवैया कहते थे। गरीब ब्राह्मण थे, और उदार भी। अंत-अंत तक उनकी गरीबी और उदारता दोनों बनी रहीं।

तारास्थान परिसर के निवासी और संगीत-मंडलियों के समाजी होने के कारण बचपन से ही मुझे उनकी संगत मिली। बचपन से ही हम यह अचरज करना सीख गये थे कि उनके गले में सरस्वती का वास है। उनके पास जो गीतों का चयन था वह भी बहुत आश्चर्यजनक था। वह निराला, पंत, दिनकर, गोपाल सिंह नेपाली के दुर्लभ गीत गाते। दिनकर का यह गीत ‘माया के मोहक वन की क्या कहूं कहानी परदेसी’ या फिर नेपाली का यह गीत ‘बदनाम रहे बटमार मगर घर को रखवालों ने लूटा’ तो उनसे सुना कई लोगों के स्मरण में होगा। एक यह गजल भी वह बहुत ही जानदार गाते थे– ‘न आना बुरा है न जाना बुरा है\  फकत रोज दिल का लगाना बुरा है।’ यह सब लेकिन, अधिकतर गुणिजनों की महफिल में होता जहां कई बार मुझे भी शरीक होने का अवसर मिला था। चन्दा झा की रामायण का गायन भी पहली बार मैंने उनसे ही सुना था। विद्यापति को तो इतनी तरह से गाते कि वह अलग ही चकित करता था। ठीक यही बात कबीर के पदों की गायकी के साथ थी। उनका जन्म 1940 के आसपास का रहा होगा। एक बार उनसे मैंने जानना भी चाहा था कि इस धुर देहात में ये सब गुण उन्होंने कहां सीखे? बताते थे कि बचपन में ही नाटक-मंडलियों के साथ लग गये थे और बाद में पंचगछिया घराने के कुछ संस्कारी गुरुओं की संगत में रहे थे।

विद्यापति के गीत ‘पिया मोर बालक’ को वह कुछ इस तरह गाते कि स्त्री की पीड़ा के नजरिये से देखें तो रुलाई आने लगती थी। द्रुत और विलंबित का एक ऐसा समीकरण बनाते कि मेरे पास उस अनुभव को व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं हैं। शायद संगीतशास्त्र के जानकार ही उसे व्यक्त कर पाएं। मैंने यह गीत कई गवैयों, यहां तक कि पं. रामचतुर मल्लिक से भी, सुना था। उनके और इनके गायन में मुझे गोचर होने योग्य अंतर दीखते। एक बार मैंने जिज्ञासा की कि काका, ये क्या है? बताया तो उन्होंने काफी देर तक, लेकिन मेरी स्मृति में बस यही है कि यह अंतर घराने (अमता और पंचगछिया) की गायकी-शैली के कारण है। विद्यापति संगीत के आधुनिक रूप को वह पंचगछिया घराने का अवदान मानते थे।

एक बार पं. मांगनलाल खवास के बारे में बात चली तो पता चला कि मांगन जी के लड़के लड्डूलाल जी की संगत में रहे थे और उन्हें गुरुस्थानीय मानते थे। मांगनलाल का काफी यश सुना था और उनकी ढेर सारी कहानियां उनके पास थीं। बताने लगे– गायक तो परमात्मा का दुलारा और अपना बादशाह आप होता है न! उसे क्या परवाह कि बड़े लोग उसे किस नजर से देखते हैं। वह दरअसल उस प्रसंग की ओर इशारा कर रहे थे कि लहेरियासराय की एक संगीतसभा में मांगनलाल जी ने आग्रह-दुराग्रह में पड़कर अपनी प्रस्तुति दे दी और यह बात उनके आश्रयदाता को इतनी बुरी लगी कि केवल इसी अपराध पर राजकुमार विश्वेश्वर सिंह ने उन्हें अपने दरबार से निकाल दिया था।

गरीबी ने बंगट जी को समझौते के लिए बाध्य किया। बाद में वह राधेश्याम कथावाचक की रामायण गाने लगे जिसे हमारे इलाके में विषय-कीर्तन कहा जाता था। लेकिन इससे भी महिषी में उनका गुजारा संभव नहीं हुआ। उनका लगभग समूचा उत्तर-जीवन सिंहेश्वरस्थान, मधेपुरा में बीता जहां के लोगों में उदारता भी अधिक थी और वहां तीर्थयात्री भी अधिक आते थे। वह स्पष्ट बताते थे कि जितनी गुणग्राहकता और श्रद्धा उन्हें यादव और बनियों से मिली, उतनी ब्राह्मणों से नहीं। वह नाभिनाल बद्ध शाक्त थे। कहते– शक्ति का उपासक वर्ण और लिंग का भेद नहीं जानता। उसके लिए क्या शौच, क्या अशौच, सब केवल महामाया की विविध छवियां हैं। तंत्रसाधक होने का गौरव भी उन्हें पूरा था, लेकिन मैथिलों की परंपराप्रियता पर कभी खीजते तो अपने को ‘कुजात ब्राह्मण’ बताते थे और उदाहरण के लिए राजकमल चौधरी का नाम ले आते थे, जिन्हें वह अपना आदर्श पुरुष बताते थे।।

नवरात्र और होली के मौके पर वह गांव जरूर आते। यह मातृभूमि का प्रेम तो था ही, उनका परिवार भी हमेशा गांव में ही रहा। कभी आर्थिक जरूरत होती तो बेटा जाकर पैसे ले आता था। मूडी आदमी थे। कोई गाने का आग्रह कर दे और वह तुरंत गाने को तैयार हो जाएं, ऐसा कम ही होता था। हारमोनियम जब सम्हालते, तब भी अपनी रौ तक पहुंचने में उन्हें वक्त लगता था। लेकिन उनकी अपनी भी कुछ चाहतें थीं। हमारे गांव में होली के एक सप्ताह पहले से ही संगीत-गोष्ठियों का दौर शुरू हो जाता था। यह ज्यादातर किसी व्यक्तिविशेष के दालान पर होता था। वह गांव में होते तो इन गोष्ठियों में जरूर पहुंचा करते थे। कभी तो ऐसा होता था कि उन्हें आया देख गृहपति सकुचा जाता–अरे, गवैया जी। हमें तो पता ही नहीं था कि आप गांव में हैं। लेकिन वह तो अपनी चाहत के रौ में होते थे।

महिषी की आज की जो युवापीढ़ी है, उसने कभी न कभी साधनालय में बंगट गवैया का विषय-कीर्तन जरूर सुना होगा। किसी में गुण हो तो वह उसके किये सभी कार्यों में प्रतिध्वनित होता है। वह आत्यन्तिक रूप से दीक्षित शाक्त थे, और वैष्णव किसी भी तरह नहीं। तांत्रिकों की गुरु-परंपरा के पूरे पालनकर्ता थे। रामकथा के साथ उनका कोई पुराना वास्ता भी नहीं था। लेकिन, एक बार जब इसे अपना लिया तो इतनी महीनी और हार्दिकता उसमें भर दी कि एक दिन कोई उन्हें सुन ले तो वर्षों तक उस अनुभव को भूलना कठिन रहता था। गायकी की उनकी गुणवत्ता अंत अंत तक बनी रही। छूटी तो गायकी ही छूट गयी, गुणवत्ता नहीं। कभी कभी हम जो चैती महोत्सव करते, या फिर युवा गायकों की गायन-प्रतियोगिता जिसमें उन्हें निर्णायक के रूप में बुलाते थे, वह खुशी खुशी शामिल होते थे। कभी-कभी अगर दबंग घरों के लड़के बेईमानी के लिए दबाव बना दिया करते, वह अड़ जाते थे। उनका अड़ना हमें बहुत ताकत देता था।

राजकमल चौधरी जब अपने आखिरी दिनों में गांव में रहने आए, उनकी अत्यन्त विश्वस्त युवा-वाहिनी में बंगट गवैया भी एक थे। इन सबके बारे में अनेक लोगों ने जहां तहां लिखा है। हमारे मित्र देवशंकर नवीन तो उस किस्से को बहुत ही रोचक ढंग से सुनाते हैं कि कैसे जब एक बार बाहर के बहुत सारे लेखक राजकमल के मेहमान हुए तो उन्होंने शाम का कार्यक्रम बंगट गवैया का गायन तय किया था। लेकिन, ऐन मौके पर बंगट फरार। लाख खोजे जाने पर भी वह कहीं नहीं मिले तो लाचारी में प्रोग्राम कैंसिल करना पड़ा। दूसरे दिन की सुबह बेंत लेकर राजकमल बंगट को खोजने निकले तो सबको यकीन था कि बंगट का हाल बेहाल होना आज तय है। लेकिन, खोजते खोजते जब वह तारास्थान परिसर में पाए गये, राजकमल ने उन्हें पकड़ लिया और बाबूजी बड़ई की दुकान पर आ धमके। कहा–आज इसे नाक तक दही-चूड़ा-पेड़ा खिलाइये। यही इस अभागे का दंड है। कभी बात उठे तो वह खुद भी राजकमल के एक से एक दुर्लभ प्रसंग बड़ी तल्लीनता से सुनाते थे। एक दिन मैंने पूछा था कि उस रोज आप कहां चले गये थे कि फूलबाबू को इतनी तरद्दुद उठानी पड़ी। कहने लगे– असल में शाम के प्रोग्राम की बात ही हम भूल गये थे। कोशी इलाके में एक खास पहुंचने का आग्रह बहुत दिन से हो रहा था, शाम को वहीं चले गये थे। उन्हें कहां मिलते?

पिछले कई वर्षों से मैं उनकी गायकी पर एक डाक्यूमेन्ट्री के लिए उन्हें तैयार कर रहा था। लेकिन, काफी दिनों से उनका स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा था। दुख है कि मेरी यह साध पूरी नहीं हुई।


इस चित्र में उनकी गायकी की एक मुद्रा दिखेगी। गीत का अगला पद अब वह गानेवाले हैं। आंखें बंद कर ली हैं। भीतर कुछ जनम रहा हो जैसे, वह आभा चेहरे पर है। उन्हें सुन चुके लोग जानते हैं कि यह उनकी पसंदीदा मुद्रा थी। यह चित्र 2015 के चैती महोत्सव का है जो महिषी के पाठक बंगले पर आयोजित हुआ था।



जातकक  जन्मोत्सवक  अवसर पर पिताक द्वारा पमरियाक दल नचैत गाबैत आबैत अछि ।
एहि अवसर मे एक  विशेष प्रकार के गीत  गाओल जैत अइछ जकरा पमारा कहल जाइछ ।
ई भेल  ‘परम आर ‘ अत्यंत गतिशील अर्थात द्रुतगति सँ  गाओल जाय वला गीत । एकर गायक परमारिक = पमरिआ थिक ।
पमरिया सब नाचि- नाचि , उछलि- उछलि ताली दैत गबैत सब के मन मोहि लैछ । कखनो तीन गोटा बैसि कए गान प्रारम्भ करैछ । पहिल आधा पद कहैछ, दोसर अगिला  आधा  पद पुरबैछ। और तेसर पदक अन्तिम शब्द दोहराए दैछ । अपन किछु नै कहैछ । तेँ लोकमें तेहेन हँ हँ भरनिहार कें ‘ पमरियाक तेसर कहल जाइछ जे एकटा प्रसिद्ध कहबी बनि गेल अछि।

एक पमरिया पैजामा, कुरता पहिरने डाँर म रंगीन गमछा बन्हने डुग्गी बजबैत अछि दोसर घघरा, कंचुक, मुरेठाक संग हाथ ओ पैर म घुंघरू बन्हने रहैछ आ तेसर चुड़की सँ तेल चुआबैत पैजामा कमीज पहिरने काजर कएने ढोलकी बजबैछ । ई सब विनु पुछनहि आंगना पहुँचि नाचि लगैछ । दर्शकक भीड़ लागि जाइछ।  पमारा के अतिरिक्त ई सब भजन, सोहर, रामजन्मक  ओ कृष्णजनमक वर्णन, चौमासा,  बरहमासा, फाग, चैतावर आदि गाबैत अछि।  मामा-भागनिक झगड़ा, सौस- पूतौहुक अनबन,  दूल्हा – दुलहिनक बतकटी  आदिक अभिनय गाबि-गाबि करैछ। बच्चा के कोरां ले  खेलबे लगैछ। अ ता धरि आपस नै करैछ जा धरि ओकर मांगक पूर्ति नै होइछ। लोग खुशि स ओकरा साड़ी , साया , धोती , नगद दैछ। एहि सँ ओकर गुजर चलैछ। पमरिया सब गाम बाटने रहैछ – ई गाम फल्लाक त ई गाम फल्लाक।

खगता पर गाम बेचियो दैछ। प्रत्येक गाम मे ओकर समदियाक रहैत छैक- चमानि , नोकर आदि जे जन्मक सूचना दए दैत छैक। मिथिलाभाषा कोष मे पमरियाक अर्थ देल अछि – पमारा गओनिहार। बदरीनाथ झाक मैथली संस्कृत कोश मे एकर अर्थ अछि- परमारकः। वर्णरत्नाकर मे त एकर उल्लेख नहि भेटल अछि, मुदा डॉ° कांचीनाथ झा ‘किरण’ वर्णरत्नाकरक  काव्यशास्त्रीयअध्यन मे मिथिलाक जातिक प्रसंग पमरियाक उल्लेख कएने छथि। मैथिलीक  प्राचीन साहित्य  राम – कृष्णक जन्मोत्सव मे एकर उल्लेख के अनुपयुक्त रहबाक कारण पमरिया के चर्चा नहि अछि। मुदा आधुनिक युग मे बदरीनाथ झा अपन एकावली परिणय मे पमरिया के चर्चा कएने छथि।

संस्कृत साहित्यो मे  एकठाम एकर प्रसंग आएल अछि । कविशेरेजीक गुणेश्वरचरिचम्पू काव्य मे धर्मकर्मावतार बाबू  गुणेश्वर सिंहक शम्भकरपुर जन्मक अवसर पर “सतालोत्तालोच्छलत्पारमारिकप्रकरमं, मंगल मयमिव सुखमयमिवास्थानमण्डपमाधिष्ठाय चिराय वितायमानमं तनुजजनुर्महोत्सव मद्राक्षित”। अर्थात ताली दैत ऊँचकए उछलैत पमरियाक दलकेँ मंगलमय जेँका सुखमय ओसराक चबूतरा पर बैसि चिरकाल सँ चलैत अपन पुत्रक जन्मोत्सव मे देखलनि। पमरियाक वाक्यचातुर्य, कलाकौशल ओ नाच- गान – वाद्यक  रमणीयता एहि मांगलिक अवसरक लेल परम उपयोगी होइछ। एहिजातिक प्रवर्तन मिथिला मे चौदहम शताब्दी मे होएब संगत प्रतीत होइछ। यवन आक्रमणकारी अपना संग हजारक हजार यवन के आनने छल जे लूटी पाटी के गुजर करैत छल।

ओकर नै वास नै वृति छलै। गामे गाम हुलैत भय पहुचाने हुनकर काज छलै। तकरा  सामाजिक  बनएबाक  लेल राजा द्वारा ओकरा गामे गाम बसाओल गेलैक आवृति (जीविका) देल गेलैक जकरा मे जे गुण छमता छलैक से ताहि वृति मे चल गेल। आ कर्मक आधार पर ओकर जाती बन गेलै  –  (1) दर्जी, (2) जोलहा, (3)  कुजरा, (4) धुनियाँ,  (5) पमरिया,  (6) मुसलमानक  हजाम, (7) फकीर  आदि। तहिया सँ पमरिया नाचि – गाबि रहल अछि ओ समाज मे सामंजस्य स्थापित करैत हर्षक धारा बहाए रहल अछि। ओना युगपरिवर्तनक कर्म मे ओ सब आब आन वृति म जाए रहल अछि आ तेँ एकर कलाक ह्रास भ’ रहल अछि ।

PC: Kapil Prajapati (youtube channel)


सारंग गीत

महुअक लेल कोबर स गोसाउनी घर जयबा कालक गीत

मिथिला मे सारंग गीत विशेष अवसर पर गाओल जाइत अछि । कंगुरिया लागल बर -कनियाँ के महुअक लेल कोबर घर सँ गोसाउनि घर जयबाकाल ई सारंग गीत गाओल जाइत अछि । कंगुरिया लागब सँ मोन पड़ल जे हम अपन संगी -संगिनी के विवाह दिनक स्मृति लेल कंगुरिया दिवसक शुभकामना दैत छी ।मिथिला मे कंगुरिया लागब विवाह क पर्यायवाची अछि । कंगुरिया शब्द सुनतहिं विवाह क मधुर स्मरण आ मोन पुलकित भs जाइत अछि ।

चलह विदुर गृह जाऊ। हे ऊधो ।
हरखित फिरथि विदुर के घरनी
मोरा गृह पाहुन आइ । हे ऊधो चलह ।

व्याकुल भेली विदुर के घरनी
की लय हरी के जिमाउ । हे ऊधो चलह ।

कन्नाक साग चन्नाकेर रोटी
ताहि लय हरि के जिमाउ । हे ऊधो चलह ।

सारंग गीत

लय चोर चीर कदम चढ़ि बैसल
कृष्ण बजाबथि बाँसुरी बन मे करत ।
मांगथी चीर देहु कृष्ण हो
हम जल माँजझ उघारी ।
जँ हम चीर देब हे राधा
जल सँ तो होउ न्यारी । बन मे करत ।
जँ हम जल स न्यारी होयब
ग्वाल हँसत दय ताली
बन में करत विहार बिहारी

सारंग गीत दीर्घकायिक नहि होइत अछि । मिथिला मे कोबर घर सँ गोसाउनि घरक बीच अँगना आबैत अछि ।कच्छप गति सँ डेग बढ़बैत बर , कंगुरिया लागल कनियाँ के मन्द स्पर्श सँ संग चलबाक संकेत करैत रहैत छथि आ गीतगाइन सारंग गीत गाबैत छथि ।

उपर्युक्त पहिल सारंग गीतक प्रसंग मनोहर अछि ।विदुर के घर पाहुन आबि रहल छनि । मैथिल लेल पाहुनक आगमन कोनो उत्सव सदृश्य होइत अछि । उत्साह -उल्लास सँ परिपूर्ण । ताहू मे पाहुन रुप मे कृष्ण । उद्धव के समाचार सुनतहिं विदुरक घरनि हर्षित भs जाइत छथि ।मुदा , ई हर्ष क्षणिक अछि । घरनी अपन घरक स्थिति के स्मरण करैत व्याकुल भs जाइत छथि ।

एहि सारंग गीत मे एकटा पाँती अछि , ” कन्नाक साग , चन्नाक रोटी ” । यैह थीक मैथिलक परिवार ।मोन पड़ैत अछि , पं. बच्चा झा ( नवानी ) के कहबी , ” अखन हमर बाड़ी मे बहुत रास साग अछि “ , ई कही ओ दरभंगा राजक चाकरी अस्वीकार कय देने रहथि । मिथिला समाजक यैह विशेषता अछि जे विष्णुतुल्य पाहुन के अबितहिं सगर गाम ओहि घरवारी के सहयोग करय लेल आतुर भs जाइत छथि ।एहिने सहयोग भाव हम अपन गाम -घर मे देखने छी जखन सभागाछी सँ बरियाती आबैत छल । कन्नाक साग , कन्ना फूलक तरुआ अधिकांश मैथिल गिरहथ लग रहैत छलनि , पाहुनक स्वागत लेल । विदुर के घरनी लग यैह किमरिफ छनि । तीमन लेल कन्ना के साग आ बदामक चिक्कस के रोटी । मोन मे कनिको ग्लानि नहि , एहि दिव्य भोजन सँ विष्णुतुल्य कृष्ण के जिमाओल गेल । एहि सारंग गीत मे मिथिला के आर्थिक पराभव आ हार्दिक हर्षभाव के अद्भुत समन्वय अछि , तैं मैथिल निर्धन भs सकैत छथि, दरिद्र किमपि नहिं । एहिठाम ज्ञातब्य अछि जे पहिल उद्धृत सारंग गीत क प्रसंग अछि , गोसाउनि घर जयबाक कालक गीत , जकर शब्द भक्तिपरक अछि । हरि भक्ति आ ताहि मे मिथिला क परिवारक चित्रण । मोनक उद्भाव आ यथार्थ क पराभव एकाकार भs गेल अछि ।

दोसर उद्धृत सारंग गीतक सामाजिक संदर्भ भिन्न अछि ।गोसाउनि घर सँ कोबर घर जयबाक प्रसंग ।मिथिला मे कोबर लिखल जाइत अछि ।कृष्ण -लीला के दृश्य । कृष्ण द्वारा गोपी के चिर हरण क गाथा ।कदंब गाछ, यमुना तट , सहित काउछ -माछ ; हास – परिहास संग संतानोत्पत्ति क संकेत ( fertility cult ) , श्रृंगार सँ आप्लावित कोबर लेखन आ तदनुरुप सारंग गीत । एहि सारंग गीतक शब्द बदलि गेल , भाव-प्रसंग बदलि गेल , ओएह कृष्ण आब बिहारी बनि नव कुंज भवन मे विहार करय लगलाह ।यैह थीक मैथिली गीतक भाव -प्रणवता ।विषयानुकूल गीत आ तकर शब्द -चित्रण । कंगुरिया धयने वर -वधु हरिक अभिनन्दन कय कोबर घर जा रहल छथि हुलसित मोन सँ , सोद्देश्य डेग भरैत , रास – लीला सँ परिपूर्ण परिवेश मे ।सारंग शब्द अपन समस्त शब्दार्थ संग उपस्थित भs जाइत छथि, सारंग नयनि, सारंग वरणी, सारंग लs चललि सारंग के….। मिथिला क सारंग गीतक ई दोसर रुप ओतबे मनोरम , कर्णप्रिय आ भावप्रधान अछि । विवाह आ ताहि मे कोबरक उल्लेख सारंग गीत के स्मरणीय बना दैत अछि, मोन के गुदगुदा दैत अछि, प्रफ्फुलित कय दैत अछि । शिव -पार्वती मिथिला क आदर्श दम्पत्ति छथि तs कृष्ण – राधा प्रेमक उत्प्रेरक । वधु नितदिन गौरी पूजैत छथि आ कृष्ण – लीला सँ उत्प्रेरित होइत रहैत छथि ।हरि आ हर के यैह समन्वय मिथिला के , मैथिल के सर्वतोभाव निष्णात बना दैत अछि जाहि मे सारंग गीत अपन शब्द -सौष्ठव सँ दू समानांतर सामाजिक यथार्थ के चित्रांकन करैत अछि ।

पेंटिंग: डाक्टर रानी झा Rani Jha


भारतीय ज्ञान परंपरा : एक दृष्टिकोण, श्री आरिफ मोहम्मद खान, राज्यपाल, केरल।‌

मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल 2019, उद्घाटन समारोह, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र सभागार, जनपथ, नई दिल्ली।

दिनांक: 8 दिसम्बर 2019

आरिफ मोहम्मद खान, माननीय गवर्नर, केरल, दीप प्रज्वलन से कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए उन्होंने अपना प्रस्तुत भाषण दिया!

प्रो. मणिन्द्र नाथ ठाकुर, श्री नितीश नंदा, सच्चिदानंद जी, देवी एवं सज्जनों!
सबसे पहले सविता जी को बहुत धन्यवाद और मुझे लगता है कि मुझे माफ़ी मांगनी चाहिए कि मेरी वजह से वह मजबूर हुई थी, उन्होंने आज यहाँ उद्घाटन समारोह रखी है. मुझे वाकई में मजबूरी थी, लेकिन मेरा यह वादा है कि जैसे ही मौका मिलेगा, कोई भी छोटा मोटा कार्यक्रम होगा हम राजनगर अवश्य जाएंगे. मिथिला से जो सांस्कृतिक नॉलेज उपजा है राजनगर उसकी एक तरह से राजधानी है. निश्चित ही हम वहां हाजिरी लगायेंगे. यह कहने के बाद पहले इस लिटरेचर फेस्टिवल का औपचारिक आरम्भ हो, उसके लिए मैं कहना चाहूंगा की:

“हम मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल 2019 के सार्थक आ सफल आयोजन के कामना करैत, एकर शुभारम्भ के घोषणा करैत छी”.

असल में लिटरेचर फेस्टिवल क्या है? असल में आप अक्षर का, नॉलेज का, विद्या का साहित्य का, कला का, नाट्य का, निरुक्त का समारोह मना रहे हैं. और मैं ज्यादा नहीं कहता, जरा गौर कीजिए हमारी 6 दार्शनिक परंपरा/विद्यालय हैं उनमें से चार कि उत्पत्ति मिथिला से हुई है. मिथिलांचल में रहने वाले लोगों को कितना मालूम है बताइए, ये क्यों हुआ ऐसा, मुझे यह प्रश्न परेशान करता था, जिस दर्शन संस्कृति ने “अहं ब्रह्मा अस्मि- तत्त्वसमि” की कल्पना दिया है दुनिया को, वहीं ब्रह्मा आपके अन्दर और वही ब्रह्मा मेरे अन्दर निवास करता है. द्वैत का भाव समाप्त करने का प्रयत्न किया है. हमारी उपनिषद ने यह बताया है कि “द्वितीय यावा वय भय भवति”, अर्थात दूसरे से इंसान को भय लगता है. तो हमारी सभ्यता को कोई समझा है तो विवेकानन्द को याद कीजिए कि मेरे अभियान बहुत आसान है और उसकी सरल व्याख्या किया जा सकता है. वह अभियान मिशन है, हमारे उपनिषदों में यह बताया है “Our mission is to preach humanity and its manifestation in all moments of live.”  सिर्फ हिन्दुस्तानियों को नहीं बल्कि पुरे मानवता को बताना है कि उनके अन्दर दिव्यता का निवास है. समस्या है कि अहं के नीचे ब्रह्म अथवा बुद्धि कि परतें दबा हुआ है. अहं अज्ञान है. वे जो स्वयं को आंकें वे प्रकृति का साकार है. “तपा स्वाध्याय निरुतम” ज्ञान है.

भगवान राम लक्ष्मण से कहते हैं कि वन में जाने से शारीर को कष्ट होगा, जो ऐसा सोचते हैं कि मैं एक शरीर हूँ वों अविद्या के शिकार है. मैं चैतन्य आत्मा हूँ और जो इस सत्य को जानते हैं उनके पास विद्या है. मनुष्य ही नहीं दुसरे जीवों में भी दिव्यता है. हम कैसे अपने विरासत के बारे में भूल गए है? ये ज्ञान फलां जाति, फलां वर्ण तथा महिलाओं को नहीं दिया जा सकता. एक खूबसूरत विचार स्वामी रंगनाथनंद जी (अध्यक्ष, राम-कृष्णा मिशन परमहंस) ने अपने एक लेख में लिखा है कि :
“सभी सभ्यताओं के पतन के दौर में हमने भारत में राजसत्ता का प्रयोग किया और ऐसी परंपरा बनाई जिसमें देश कि बड़ी आबादी को ज्ञान से वंचित कर दिया और यह पतन के काल में हुआ है और यह हमारी परंपरा का हिस्सा नहीं है”.

स्वामी जी ने श्रीमद-भागवत का उदाहरण दिया है और कहा है कि कोई भी व्यक्ति जो दूसरे से ज्ञान को छिपाए, उसके लिए शब्द का प्रयोग हुआ है: “सरस्वती खल शत्रु” (Villain). तो सरस्वती के उपासक वे नहीं हो सकते जो खल करते है. यदि आप ज्ञान छुपा रहें हैं तो आप उपासक नहीं हैं, आप उनके खल हैं. दुनिया की दूसरी संस्कृति में विविधता से लोग परेशान होते थे, केवल भारत में विविधता विधमान रही है. जबकि पूरे विश्व में विविधता 200 वर्ष पूर्व आई. यहाँ तो विविधता की शुरुआत के साथ यात्रा आरम्भ होती है, “एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति” अर्थात एक सत्य है. एक ही परिवार के सभी लोगों का विचार-आचार तथा संरचना एक नहीं होती बल्कि हमें सौहर्दता प्रदान करनी होती है. हमें विविधता ने कभी परेशान नहीं किया. हम तो विविधता को अपना तत्व माने हैं. दो लोगों का समझ एक ही पुस्तक को दो ढंग से समझेंगे. और अपने समझ को खुदा का क़ानून बताउ, समस्या वहां से शुरू होती है. ये तो उन व्यक्ति विशेष का समझ है. मेरी समझ तो प्रतिदिन विकसित होती है न, इसलिए अंतिम मुहर लगा दूँ तो खुदा के पुस्तक के साथ भी नाइंसाफी है.
एक हिंदी के कवि ने कहा है राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं जो एक वाणी, एक बानी, एक पत्नी को निभाएं तो वही कृष्ण लीला पुरुषोत्तम, माखनचोर, चित्तचोर हैं. दोनों एक ही हैं लेकिन युग के अनुसार अवतार है। एक मर्यादा पुरुषोत्तम है, दूसरा लीला पुरुषोत्तम हैं। पिता भी चाहते थे कि राम उस समय को न माने लेकिन राम ने ऐसा नहीं किया, वही कृष्ण ने महाभारत में कोई नियम ऐसा है ही नहीं जिसकी कमर न तोड़ी हो । भगवान श्री कृष्ण और राम में लेकिन एक समानता है दोनों में से एक भी ने अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए कुछ नहीं किया जो भी किया लोक कल्याण, लोक सिद्धि के लिए किया। तो हमने हमेशा यह माना है कि “सर्वज्ञम तत् अहं वन्दे परम् ज्योतिष तपो अहं तीरवरतायम मुखात देवी  सर्व भाषा सरस्वती”। जितनी दुनिया की भाषाएँ हैं, भाषा बोली के अंतर को समझना चाहिए और ये सभी भाषाएँ  माता सरस्वती कि बोली हैं। हर भाषा एक संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है। जितनी भाषाएँ हम सीख सकते है हमें सीखनी चाहिए। हदीस में लिखा गया है कि भाषा किसी भी समाज की मानसिकता का माध्यम है। और सविता जी आपसे माफी चाहता हूँ की इतने लोग सभागार में है, दिल्ली में इतने बजे तो संसद भी शुरू नहीं होता है। 11 बजे दिल्ली में काम का वक्त शुरू ही होता है। और आज तो रविवार है 10 बजे यदि 10 लोग भी हो तो खुशी की बात है।  दिल्ली में मिथिला साहित्य की सभा हो और इतने लोग उपस्थित हो तो ये बहुत खुशी की बात है।

विश्व गुरु की उपाधि किसी ने नहीं दिया। 9 वीं और 10 वीं शताब्दी में मध्य पूर्व देश(अरब) में इतिहास लिखा जा रहा था। बगदाद में House of wisdom को विश्वविद्यालय मान सकते हैं। यूरोप में अभी भी पुनर्जागरण नहीं शुरू हुआ था। वहाँ के खलीफा ने खत लिखा की: – मैंने सुना है तुम्हारे पास बहुत किताब है जिस पर तुमने ताला डाला है, क्या तुम इसमें से कुछ हमें दे सकते हो ? तीन दिन काउन्सिल की मीटिंग चली, उन्होंने कहा कि अरब अभी बौद्धिकता के क्रांति में है, इसको भ्रष्ट करने का यही सही तरीका है, ये कुछ किताबें मांग रहे है सारी इन्हीं को दे दो और उन्होंने सारी यूरोपीय किताबें ऊँटों पर लाद के भेजवा दिया। उसी समय कई भारतीय पुस्तकों का अरबी में अनुवाद किया गया। 8 वीं सदी में एक कनक नाम का पंडित  कुछ किताबें ले कर बगदाद पहुँचता है। उसमें एक किताब है जिसका नाम है “सूर्य-सिद्धांत”। सूर्य-सिद्धांत के कुछ हिस्सों को अनुवाद करके खलीफा मंसूर को सुनाया जाता है। वों इतना  मोहित हो जाता है सुन के कि वो अरब के एक ज्ञानी को बुलाता है और कनक को उसके साथ मीटिंग करवाता है और कहता है इस किताब का अनुवाद अरबी में करवाओ । स्पेन के खलीफा को पता चलता है कि  एक कोई  बहुत अच्छी किताब है जो हिंदुस्तान से आई है और जिसका अरबी में अनुवाद हो रहा है। वों भारी रिश्वत दे के किताब छापने वाले से उसकी एक कॉपी निकलवा लेता है। अरबी में उस किताब को नाम दिया जाता है “हिन्द-सिंध”। “हिन्द-सिंध” पुस्तक का अनुवाद यूरोप के सभी पुस्तकालय में आ जाती है और ये वहाँ पुनर्जागरण का कारण बनती है। ये इतिहास की बात है इसलिए विश्वगुरु की बात आती है। भारत के बारे में ये उपाधि से नहीं आती यह रिकग्निशन से आती है।

ऋषियों ने कल्पना की थी। 9 वीं, 10 वीं सदी में अरब के विद्वानों ने इतिहास लिखा,  इसमें इब्न-खलदून, इब्ने-असीर, तबरीक, याकूबी, मासुबी सभी ने पहला अध्याय हिंदुस्तान पर लिखा है और वो कहते है कि दुनिया मे 4 सभ्यता है (१) ईरानी(शान शौकत और वैभव के लिए), (२) रोमन(सुंदरता के लिए), (३) चीनी( हुनरमंद और कौशल, कानून की आज्ञा अनुपालन  के लिए) (४) भारत(अपनी ज्ञान, परम्परा के लिए जाना जाता है) और वो सिर्फ नहीं कह रहे है, 7 वीं सदी में हुजूर  सस्सलम पैगम्बर मदीने में बैठ के (भारत कभी आये नहीं) कह रहे है कि मैं हिंदुस्तान की सर जमीं  से ज्ञान की शीतल हवा की आती ठंडाई महसूस कर रहा हूँ। इकबाल ने इसे कहा है “भिरे अरब को आयी ठंडी हवा जहाँ से नज्म में “। हमें अपने आप को कोई उपाधि लेने का कोई अधिकार नहीं था लेकिन दूसरों ने इसे स्वीकार किया है/ किया था। हमारी बदकिस्मती जहाँ हमें जहां सोचना चाहिए आज हम खुद अपने परम्परा से परिचित नहीं हैं। हमारी ऋषियों ने जो कल्पना की थी वो इस प्रकार है “एतद् देशा परसु तस्या सकाक्षात अग्रज अनमना, सोम सम  चरित्रम शिक्षेरण पृथ्वीयं सर्वम आनवहः”।

हमारे ऋषियों ने कल्पना की थी कि दुनिया के लोग हमारी परंपरा और वों अपनी परम्परा का ज्ञान लेने भारत आएंगे और ऐसी परिस्थिति तब थी जब हमारे ऋषि थे। हमारे पास ऐसी  बौद्धिकता है कि क्रिस्तानी और इस्लाम को अध्यन करने लोग हिंदुस्तान आते हैं। तुलसीदास जी कहते है कि ‘कोई न रहे कहानी दासी बन जईहे रानी’। पानीपत में जितनी फौजें थी उससे ज्यादा तमाशा देखने वाले थे की बाबर जीतेगा या लोदी!! क्योंकि वे अपनी दीन को बदलना चाहते थे अज्ञानस्वरूप। मुझे  कपड़े ही धोना है मेरा क्या स्टेटस है । आज हम वहाँ नहीं है जहाँ थे। आज तो मोची भी जिसके पास दुकान नहीं है उसके बच्चे भी बेहतरीन स्कूल में से एक मे पढ़ते है।  उनके ऊपर छत नहीं है लेकिन वो भी आगे बढ़ना चाहते है। फेस्टिवल का मतलब यह है की जिम्मेदारी महसूस करें जो ज्ञान से वंचित है। हमारी पढ़ाई पर समाज सम्पूर्ण का पैसा खर्चा हुआ है। फेस्टिवल इसलिए अच्छा लगता है कि हम ज्ञान का अर्थात शब्द का  उत्सव मनाते है। उत्सव में सब होना चाहिए। आप ये काम करेंगे हमे पूरा विश्वास है। एक बार फिर आपको धन्यवाद देते हुए विदा लेना चाहता हूँ। धन्यवाद।।

जय हिन्द, जय भारत!!

आरिफ मोहम्मद खान, माननीय गवर्नर, केरल राज्य, भारत।


Seeing Mithila through the lens of Varnaratnakāra: The text and the Context

This paper is an attempt to locate the region Mithila through the Varnaratnakāra, a text of curious subject matter. To begin with, at the request of the Asiatic Society of Bengal and through the authorisation of the Bengal Government, Pandit Haraprasand Sastri conducted a search for Sanskrit manuscripts during the years 1895 to 1900 with the assistance of Pandita Rakhala candra kavyatirtha and Pandita Vinoda-Vihari Kavyatirtha.

It was Pandita Vinoda-Vihari Kavyatirtha who discovered the Varnaratnakāra of Jyotirīsvara -Kavisekharacraya during his travel to all over Bengal (including Bihar, Chota Nagpur and Orissa). Thus it was Pandit haraprasad Sastri who brought the text to the academic platform. It is the oldest prose work of Maithili language (North Bihar) preserved in a unique MS. On palm leaf now in the library of the Royal Asiatic Society of Bengal, in its Government Collection of MSS (48/34).

Suniti Kumar Chatterjee and Babua Misra edited the text and was first published in 1940 printed by the Royal Asiatic Society of Bengal. Suniti Kumar Chatterjee in the introduction to the texts attests to the its Maithili origin and Maithili characters and also the fact that no other Bengali or Maithili manuscript of that age (14th century) has yet been discovered.

Written in 1324 CE by the Maithili scholar, priest and poet Jyotirīsvara Thākkura, It is in a nature of a compendium but it is descriptive and contains graphic and detailed sketches of many important aspects of the social economic life of its time.
The subject matter of the text in the words of Pandit Haraprasad Sastri is:

The subject matter of the book is very curious. It gives the poetic conventions. It is a sort of vernacular and Sanskrit terms, a repository of literary similes and conventions dealing with the various things in the world and ideas, which are usually treated, in poetry. We have in it either bare list of terms, or the similes and conventions are set in the framework of a number of ‘descriptions1.

The text is divided into seven or apparently eight chapters called the kallolas. The work is in prose.
The chapters are suitably called Kallolas’ (streams or waves) as the work is a Ratnakāra, i.e., Sea.
In each kallola, there are a number of these lists of terms and conventional similes; each of these lists, or descriptions, is preceded by the formula- atha Varnana. Each kallola has at its end its name, together with the name of the author and the title of the work.

The Kallolas are as follows:

  • Nagara Varnana (description of the city)
  • Nāyika Varnana (description of the Hero)
  • Asthān Varnana (description of royal court)
  • Rītu Varnana (description of seasons)
  • Prayānak Varnana (various subjects including war, conquest and troops etc)
  • Bhāttādi Varnana (desciption of court bards)
  • Saṁsāna Varnana (description of the cemetery)
  • The title of this kallola (eighth) is missing

The text contains the descriptions of the city; the author has described jewels, clothes, fine expensive stuffs, tents, gambling houses, doctors, astrologers indicating the beautiful city life prevalent in Mithila.

In the Asthān varnana, he has described the beauty and grandeur of the court. In another chapter, kallola he talks about the wars, horses, forests, mountains, cemetery etc. on one hand and the music, dance, poetry on the other thus including everything he witnessed and heard.

Therefore in the words of Suniti Kumar Chatterjee, ‘it is a compendium of life and culture of medieval India in general and of Mithila in particular. the author takes us through the city and gives us a little glimpse into the ugliness that was in a ‘city’
Geographically, the region of Mithila is difficult to locate in the territorial boundaries except on the north, where the Himalayas are immovable. Mithila is a cultural zone that has never remained static.

In the Mithila Mahatmya Khanda of the Brihad Vishnu Purana (5th century CE) , we get an accurate idea of the region. It describes Mithila as situated between the river Ganga and the Himalayas, extending over 15 rivers and from kosi to the Gandaki in the west, for 24 yojanas and from Ganga to the forests of Himalayas for 16 yojanas.
The name Tairabhuktisca mentioned in the list of 26 names of Mithila in the Mithila Mahatmya also indicates its geographical location between the three rivers ganga, gandak and Kosi.

There are many persistent ideas found scattered throughout history and it is largely based on the inferences and the conjectures.
The river Ganga flowing from west to east divides Bihar into two parts, northern and southern. The northern part is constituted by three cultural zones viz, north eastern zone known as Mithila (Maithili speaking area), north west Bhojpuri speaking belt and between the two lies the region of Vajjika speaking people.
Mithila is a cultural-linguistic zone of the eastern part of India. The following districts are generally supposed to constitute the region today: Sitamarhi, Sheohar, Darbhanga, Samastipur, Madhubani, Begusarai, Seharsa, Supaul, Medhepur, Purnia, Katihar, Araria and Khagaria. The southeastern terai of Nepal is also recognized as part of the cultural zone of Mithila.
The Varnaratnakāra also provides a social survey of a city/town of Mithila and its surrounding areas with a clear distinction and spaces.
In recent times, the territory of Raj Darbhanga, one of the richest and largest estates in India of great Zamindari (landlords) coincided very roughly with the region of Mithila in north Bihar, extending into the districts of Monghyr, Bhagalpur and Purnea. The capital of Raj Darbhanga was the city of Darbhanga.
Local historians have noticed a shift to this administrative centre from the sacred centre of the Maithili Brahmins from different places to the core areas of Soitpura or Sotipur (a sacred geography with its heartland being triangle between Darbhanga, Madhubani and Madhepur), where in a group of 36 villages, all the highest ranking Brahmins, i.e. the Shrotriyas have their residences (or trace their original belongings).

The Sahadriya Khanda (a text belonging to the twelfth century) clearly mentions the name of Maithili Brahmins among the five dominant Brahmin communities in north India which indicates of Mithila emerging as an important cultural as well as a linguistic centre. Also Darbhanga, the heartland of Mithila, was also one of the Mahals in the Sarkar of Tirhut during the reign of Akbar, the Mughal ruler.

On the other hand, the Pañjī Prabandha (tradition of recording the genealogies) a unique institution of Maithili Brahmins established the endogamous boundaries of a new Maithili Brahmin community through the restriction on marriages and reproduction. The system is important for the sake of our discussion because it also dictates the future membership in the community, which established its territorial boundaries as well. The frequency of Land Grants to Brahmins during the period preceding the period under consideration indicated the growing popularity of the region (sources indicates the Brahmins migrating to the region of Mithila). The Pancobh Copper Plate inscription is an important example referring to the migration of people (Brahmins) from Kolancha to this region in the 11th century CE. The Bangaon Copper plate inscription also indicates that a Brahmin names Ghāṇṭūkaśarman from Kolancha was given land in north Bihar in the 12th century.
In her study of Brahmin migration in north India, Swati Datta writes that one of the chief causes of migration among Brahmins was political instability in home regions and the desire for security and stability, and improved livelihood. Therefore it is certain that by the 12th century the region Mithila had acquire a distinctive position and an identity of its own.

The texts deals with various topics including the production and commerce, the mechants and traders, the rulers and prostitutes and even the name of many countries seems to have visited the court of Mithila during the fourteenth century.
Jyotirīsvara mentions flattened rice (Churā, Chividyani) and fried rice (farhi). Thus, a fine variety of Churā (parched rice) with a heavy coat of thick curd and cream seems to have been a popular food of Mithila. Other items included Mungwa, Ladivi, Saruāri, Madhukupī, Mātha, Fenā, Tilwā, etc. He took delight in describing these items in feasts of the region

‘dadhi sharataka chandrama purnima pray…chewula uppar dadhidela’.
The use of betal-leaves (Pān) in Mithila was very popular then and now. The people of Mithila were adept in the use of betal leaves and Jyotirīsvara has prescribed a number of methods for the use of betals.
“nayaken pān mukhasuddhi kayela”
“Pan karpurak biniyoga”.

Jyotirīsvara has mentioned thirteen qualities of betel-leaves and has given a list of the varieties of spices and betel-nuts imported from other places.

“muktāk chūna, sindhuka kandakola, sinhal dwipak jātī fal, kanchik mukimen..ekone Sonjoge lagawal panchfal”.

There is a long list of the industries found in the text which includes fisheries, salt, opium liquor, iron, sugar, metal work, paper industry, stone and brisk works and various others such as inlay of stone works and enameling are mentioned. Other items includes alchohol (madira), oil (Sughandha elātel) and shampoo of at least four kinds such as Sõndu, Goñdu, Kiratū and Kānhū

We have an elaborate discussion about the textile and the costumes. It is very interesting to know that in the matter of costumes and dress materials, Jyotirīsvara doesn’t include the dresses worn by the women.
The textile industry included the manufacture of cotton, woolen and silk cloths in which the Dyeing industry, calico printing industry etc. also were imvolved.
Jyotirīsvara mentions as many as 43 stuffs manufactured in the country (des̃i) or imported in the separate lists named vastra varnana, the desiya varnana, the nirbhusan varnana, the neta varnana etc.

Horses are frequently mentioned. Asvavidya, asvavahaka, asva-ratha, asvaprakara are some of them. Asvaratha is mentioned in the list of the sorodasamahadana-varnana (16 mahadanas, great gifts). The various named of horses are turang ghola and ātāji, also horses of 24 breeds are mentioned.

Along with it the text also contains innumerable references to articles of diferent metals like gold, silver, bell-metal, alloy of eight metals (astạdhātu) etc.

It has been noted that region of Mithila was agriculturally one of the most developed and prosperous regions of eastern India. The other two main sources of wealth were Trade and fishing.

Stephen Henningham in his outstanding work ‘A Great Estate and its Landlords in Colonial India’ has shown the twin city of Darbhanga has been a prominent urban center already when the British rule was established. The main source of Mithila’s wealth (as is true for whole India) was agriculture. The natural fertility of the soil in most parts, copious rainfall and irrigation facilities provided since the early times, combined with industry of their peasants, Rich crops, such as cotton, sugarcane, lintents, oilseeds poppy, indigo etc., were produced in a large scale.

Though agriculture was occupation of the bulk of the people, there were many important industries in the rural as well as the urban areas. The trade and commerce have played a vital role in making Mithila evolve as a major actor in the economic world in ancient and medieval times. The period was marked by substantial commercial activities and urban developments. Literary evidences have shown that trade and commerce was the mainstay of the economy carried out by water and land.

To conclude, the above account of the various subjects described or listed the very great value of the text can be easily seen. It gives the microscopic view as Jyotirīsvara has witnessed the times quite evident in the description. While on one hand the presence of the Turko-Persian-Arabic words and on the other hand the knowledge of mostly Brahmanical works like the Puranas and the Mahabharata as well as the descriptions of the countries and the items exchanged clearly shows that the text cannot be ignored as it proves of the vibrant economy, a part of the composite culture.

1.Quoted in Suniti Kumar Chatterjee Introduction


Chatterji, Suniti Kumar and Babua Miśra Eds. Varṅaratnakāra of Jyotirīsvara-Kaviśekharacārya, edited with English and Maithili introductions. The Royal Asiatic Society of Bengal. 1940.

Choudhary, Radhakrishna, ed. “The Panichobh Copperplate of Samgramagupta (C. 12th-13th Cent. A. D.)” In Select Inscriptions of Bihar, Introduction and Appendix in English and Text in Sanskrit, 113–115. Madhipura: Shanti Devi, 1958.

Datta, Swati. Migrant Brāhmaṇas in Northern India: Their Settlement and General Impact, c. A.D. 475–1030. Delhi: Motilal Banarsidass, 1989.

Henningham, Stephen. A Great Estate and Its Landlords in Colonial India, Darbhanga, 1860–1942. Delhi: Oxford University Press, 1990.

Sircar, Dineschandra. “Bangaon Plate of Vigrahapal III; Regnal Year 17.” Epigraphia Indica XXIX, pt. I (1951): 48–57.


CSTS Covid Initiative

Amidst the insurgency of covid-19 pandemic, Maithili Machaan has committed itself in combating the challenges being faced by unprivileged people. It had played a vital role in battling the monster virus. Several initiatives had been taken in the past few months. Those initiatives not just include aiding people physically but also psychologically.

It had been persistently providing free medical consultation to people. Else, it collaborated with two organisations : Jan man People’s foundation and Ayachi Nagar yuva sangathan. These organisations have been actively putting efforts on the ground and helping people to access basic necessities, medical facilities and consultation. Mithila Machaan also released a poster consisting of important numbers of concerned people who could help the needy. Through the poster the team manifested that they would exert themselves to help the deprived with necessities, food, medical consultation and so on.


Apart from its lead on the ground, Mithila Machan has been in the frontline to help people psychologically as well. It had been organising virtual sessions to help people in all the possible ways.
Maithili machaan had conducted a session with Vaidh Ganpati Jha who is an ayurvedic expertise. In that session, he answered to the general queries of people regarding home and ayurvedic remedies. He further elaborated about the precautions and common medications we can take at home.

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Moreover, the sister organization MLF has been conducting a series namely , “Hum jitenge” which is being hosted by Navin Chaudhary. In every next episode, Navin Chaudhary use to have a conversation with corona warriors who share a part of their recovering story. The sole motive of running this programme is to generate positive notion in audience’s psyche.

The nobel corona virus has wreaked havoc in India. During these hard times, Machaan had taken a major step to remind people that it is high time to adapt yoga as a part of our daily routine. Machaan had several sessions with Dr Hridayanand Jha who is an ayurvedic and yog expertise. In the very session he tried connecting with people and claimed pranayamas and asanas assist to build up a strong immunity system. Apart from covid, he also demonstrated how yoga helps us in coping up with multiple other health complications. The session was interactive and commendable.

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The another remarkable session Machaan had was with Dr. Abhinav shrestha Jha. He was himself unwell few days ago, still he came and addressed all the questions very calmly and patiently. Few major points Jha said included ; alertness and prevention is must. Similarly, he told lack of information might be creating difficulties. On the other hand getting trapped into misleading information can be very dangerous. As an end note, he encouraged the audience asserting, “corona is a disease, it might come but don’t stress yourself out. With patience, precautions and proper medications we can fight back.”

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Moreover, Machaan organised a session having Praveen Jha and Dhairyakant who have been continuously working in Darbhanga and Madhubani to bring awareness among people and to aid them with minor medical consultation and facilities. It was not just a session on elaborating and apprasing their efforts. The session was more about conversing on the ground reality specially in rural areas. Jha and kant also qouted how people are either taking corona very lightly or have developed a phobia. There is no in between. They claimed this unbalanced thought process of people to be a huge challenge.

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Due to lack of awareness and information the cases have been rapidly increasing in rural areas. Amid the increasing cases, lockdown and so on, people are facing inverse effects on other factors as well. In this session there were three panelists. Author Anushakti Singh,Vickey Mandal, Shaurya Roy. They interpreted how youths have come out to form alliances and help needy druing this difficult time. They explained how they have been helping people of their village with basic necessities, medicines, counseling and so on. Furthermore, they also discussed about the upcoming steps that could be taken. Lastly, they made appeal that how social networking sites could be used to raise awareness programmes and in various ways that could help people fight this pandemic. Machaan had ensured them to help them in all the possible ways from its end.

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Machaan invited Padma Shree Dr Usha Kiran Khan for the session where she talked about khadi, village industries and Gandhi. She particularly conversed about Gandhian leaning and legacy. In the session, she manifested about the post covid prerequisites and what could be the role of various parties. Either it is authority or civilians. In a statement she quoted that, “khadi is not just a piece of cloth, it is itself a very extensive word. It is a way of living instead.” She suggested that youths should come forward and join hands together to run and promote the cottage industries. The session covered historical dimensions. It was full of Khan’s intellect preaching.

Machaan had also bridged the gap between people of common origin, thoughts and identity. As a group, Machaan had always encouraged people to come out and share their views. Through the platform, people had come along with various posters, piece of writings, paintings etc to bring awareness among people.
The group members had also posted distinct videos concerned to covid precautions, management and cure.

Similarly, Dr. Shefalika Verma also posted a video of her daughter who is a doctor based in England, sharing her point of views on the pandemic. The video included relevant information about covid-19.

Similarly, there were another sessions, such as the session with Dr Nishank Shekhar Thakur. He potrayed how complicated the situation is when one of the family member is infected. He still asked people not to loose hope. It is possible that not everyone in the family gets positive report in such case as well. But only if we try and take preventive measures. He summarised about taking care of the patient and own self efficiently.

A session namely, “corona vimarsh” (corona discussion) was held where youths who had been working in the grassroot level were the panelists. Guriya shah, Dr kumudanand Jha, pushya Mitra, Vashu Mitra, Vikkey Ray, Utpal were the panelists. They manifested about the situation and challenges of the ground. Machaan had always appraised their heroic move. Hence, it had ensured them for all the possible assistance from its part.

In the wake of this deadly pandemic where the whole world is in crisis, Maithili Machaan believes that every help counts. It believes that, together we can fight this pandemic through grit and resilience. It has still been continuously working to identify the needs of community and looking forward to help them out in all the possible manner.

Report by Mitali Bhardwaj