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श्री मिथिला परिक्रमा: श्री जानकी मंदिर, एक पड़ाव!! – CSTS

श्री मिथिला परिक्रमा: श्री जानकी मंदिर, एक पड़ाव!!

November 15, 2022 इतिहास Admin
श्री मिथिला परिक्रमा: श्री जानकी मंदिर, एक पड़ाव!!

पुराणों के अनुसार इस मिथिला-परिक्रमा का बहुत महत्व है। जिस मिथिला धाम के नाम लेने मात्र से समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती हो उस मिथिला की परिक्रमा और प्रदक्षिणा का फल कितना दिव्य होगा यह कहने की आवश्यकता नहीं है।श्री पराशर जी ने इसी सन्दर्भ में श्री मैत्रेय जी से कहा कि परिक्रमा करने वाले की तो बात ही छोड़िए जो व्यक्ति इस मिथिला-परिक्रमा को करने का संकल्प भी लेता है या विचार भी करता है उसके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। ऐसे में इस परिक्रमा को पूर्ण करने वाले के तो स्वयं के साथ कुल और पितृगण का भी उद्धार हो जाता है। त्रेताकाल से चलती आ रही इस परिक्रमा की शुरुआत, इस युग में श्री सूरकिशोर बाबा के आगमन से पूर्व ही हो गई थी और उनके आगमन तथा जनकपुर आदि के प्रादुर्भाव के बाद यह वृहत और व्यापक रूप में की जाने लगी।

अट्ठारहवीं शताब्दी में रचे गए मिथिला माहात्म्य ग्रन्थ में इस परिक्रमा का विशेष वर्णन मिलता है जिसमें भारत और नेपाल के बीच 128 किलोमीटर की दूरी तक की जाने वाली विशाल परिक्रमा का विवरण दिया गया है। मिथिला की सम्पूर्ण भूमि चौरासी कोस की मान कर इस परिक्रमा को आम भाषा में चौरासी कोस परिक्रमा भी कहते हैं। यह परिक्रमा जनकपुर से की जाती है और यही इसकी परंपरा रही है। मिथिला माहात्म्य के अध्याय तीन के अंतर्गत इस परिक्रमा को करने के लिए तीन समय बताए गए हैं- कार्तिक (अक्टूबर-नवम्बर), फागुन (फरवरी-मार्च) और वैशाख(अप्रैल-मई) महीना।लेकिन अभी की जाने वाली परिक्रमा में फागुन माह की परिक्रमा ही विशेष चर्चा में होती है।
पुस्तक के अनुसार यहाँ तीन प्रकार की परिक्रमा का विवरण आता है:

1.वृहत -परिक्रमा 2. मध्य-परिक्रमा और 3. लघु -परिक्रमा

इस परिक्रमा के अंतर्गत श्री मिथिला बिहारी जी और श्री किशोरी जी का डोला सजाया जाता है और उसमें दोनों युगल सरकार को स्थापित कर उनकी झाँकियों को भ्रमण में संग लेकर चलते हैं। साथ में संत, सन्यासी, गृहस्त, भजन-कीर्तन की टोली आदि चलती है और ईश्वर का गुणगान करते हुए पैदल ही यह परिक्रमा पूर्ण करनी होती है। रात भर जहाँ भी यह टोली विश्राम करती है वहाँ भजन-कीर्तन आदि अनवरत चलते रहते हैं।इस परिक्रमा के अंतर्गत जिस-जिस स्थान से यह डोला गुजरता है उस स्थान के निवासी और ग्रामवासी सेवा-सत्कार का कोई भी अवसर नहीं गंवाते अपितु सभी गाँवों में इस डोला-भ्रमण की प्रतीक्षा होती रहती है और जहाँ यह डोला विश्राम लेता है उस ग्राम के लोग और भक्त इसकी पूर्ण व्यवस्था करते हैं। इस डोला-परिक्रमा में सम्पूर्ण मिथिला उत्साहित होकर भाग लेती है।

वृहत-परिक्रमा:
वास्तव में वृहद परिक्रमा गृहस्तों के लिए नहीं है क्योंकि इसे करने में मिथिला के चारों ओर चौरासी कोस की परिक्रमा होती है जिसके अंतर्गत लगभग 268 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है जिसे करने के लिए एक वर्ष लग जाता है।शुरू में यह परिक्रमा बस सन्यासियों के द्वारा ही की जाती थी किन्तु समय के साथ यह गौण होती गई और अब यह परिक्रमा नहीं की जाती है। वैसे इस परिक्रमा का प्रारम्भ कौशिकी नदी के तट से किया जाता था जो फिर बाबा सिंघेश्वर स्थान(सहरसा)से होते हुए गुजरती थी। फिर सिंघेश्वर स्थान से यह परिक्रमा पश्चिम की ओर बढाती थी और गंगा नदी के सिमरिया घाट तक जाती थी जहाँ से पुनः यह परिक्रमा मुड़ती थी और हिमालय के तराई क्षेत्रों (नेपाल आदि) से होते हुए वापस कौशिकी नदी तट पर आती थी। वहाँ से पुनः यह परिक्रमा सिंघेश्वर मंदिर में आकर समाप्त होती थी। कालक्रम में होने वाले व्यवधानों और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण कम होते होते अब यह वृहत परिक्रमा विलुप्त प्राय हो गई है।

मध्य- परिक्रमा(आधुनिक वृहत परिक्रमा):
आधुनिक काल में यही परिक्रमा वृहत परिक्रमा मानी जाती है जिसके अंदर लगभग मिथिला के चारों ओर चालीस-बयालीस कोस की परिक्रमा होती है जो लगभग 128 किलोमीटर तक की जाती है। किन्तु अब इसे ही चौरासी कोस परिक्रमा के नाम से जाना जाता है।

ग्रन्थ के हिसाब से इस परिक्रमा को पाँच दिन में पूर्ण कर लेना चाहिए लेकिन मिथिला के पंडितों ने समय और व्यवस्था को देखते हुए इस परिक्रमा के लिए पंद्रह (15) दिन का समय निर्धारित किया है जिससे बड़े- बूढ़े और अस्वस्थ व्यक्ति भी इस परिक्रमा को पूर्ण कर अपना जीवन कृतार्थ कर सकें।

वर्तमान समय में यह परिक्रमा फागुन (फरवरी-मार्च) माह की अमावश्या तिथि को प्रारम्भ होती है और इसी दिन श्री मिथिला बिहारी और श्री किशोरी जी का डोला परिक्रमा के लिए उठाया जाता है। लगातार पंद्रह दिनों तक चलने वाली यह परिक्रम फागुन शुक्ल-पक्ष पूर्णिमा (होली) से एक दिन पहले चतुर्दशी को समाप्त होती है। इन पंद्रह दिनों में प्रत्येक रात्रि को एक विश्राम स्थल बनाया गया है जहाँ डोला-यात्रा रोकी जाती है।

अमावश्या के दिन यह यात्रा नेपाल अधिकृत मिथिला के धनुषा जिले के पास कचुरी गांव से शुरू होती है जो जनकपुर से लगभग12किमी दूर है और वहाँ से उठाकर प्रथम रात्रि को जनकपुर के हनुमान नगर में विश्राम लेती है। जनकपुर स्थित हनुमान-नगर का हनुमान मंदिर इस यात्रा का पहल पड़ाव है।

दूसरे दिन (प्रतिपदा) को यह यात्रा हनुमान नगर से निकल कर कल्याणेश्वर महादेव (कलना) के मंदिर के पास विश्राम लेता है। तीसरे दिन (द्वितिया) को यह डोला कल्याणेश्वर महादेव को प्रणाम कर गिरिजा-स्थान (फुलहर) में जाकर विश्राम लेता है। चौथे दिन(तृतीया) को माँ गिरिजा के आशीर्वाद से यह डोला उठता है और मटिहानी के विष्णु-मंदिर में जाकर विश्राम लेता है। फिर पाँचवें दिन (चौठ) को यह डोला सारे दिन भ्रमण करते हुए मार्ग में जलेश्वर महादेव की शरण में विश्राम लेता है।

छठे दिन ( पंचमी ) को यह डोला जलेश्वर से उठ आकर मार्ग में कीर्तन भजन आदि करते हुए मड़ई पहुँचता है जहाँ माण्डव्य ऋषि का आश्रम है। सातवें दिन (षष्ठी) को यह डोला उठ कर अपनी अगली यात्रा पर विदा होता है और रात्रि में ध्रुव-कुंड के निकट ध्रुव मंदिर के पास विश्राम लेता है। तत्पश्चात आठवें दिन (सप्तमी) को यह डोला उठ कर जनकपुर के निकट के कंचन-वन में विश्राम लेता है जहाँ श्री किशोरी जी की रास स्थली मानी जाती है। यहाँ रात्रि भर बहुत सुन्दर उत्सव आदि होते रहते हैं और भजन-कीर्तन अनवरत चलता रहता है। नौमे दिन (अष्ट्मी ) को यह डोला कंचन वन से विदा लेते हुए पर्वत में विश्राम करता है जहाँ पाँच पवित्र पहाड़ों का दर्शन होता है। तत्पश्चात दसवें दिन (नवमी) को यह डोला पवित्र धनुषा-धाम को पहुँचता है जहाँ शिव जी के टूटे हुए पिनाक धनुष का मध्य भाग रखा हुआ है।

पुनः ग्यारहवें दिन(दशमी), यह डोला सतोखरि में विश्राम लेता है जहाँ सात कुंड एक साथ हैं। फिर बारहवें दिन(एकादशी), सतोखरि से चलकर यह डोला औराही फिर तेरहवें दिन वहाँ से करुणा और चौदहवें दिन (त्रियोदशी ) को बिसौल में जाकर विश्राम लेता है जहाँ श्री विश्वामित्र जी का मंदिर है। अंत में बिसौल से होते हुए पन्द्रहवें दिन (चतुर्दशी ), ये डोला जनकपुर पहुँचता है और वहाँ श्री किशोरी जी के दर्शन के पश्चात यह परिक्रमा समाप्त मानी जाती है ।

इस पूरे यात्रा के दौरान श्री मिथिला बिहारी और जनक दुलारी जी के डोले को बहुत खूबसूरती से सजाया जाता है और एक बड़े ध्वज के साथ एक मजबूत मंच पर रखा जाता है, जिसके चारों ओर भजन और कीर्तन करते हुए यात्रा और विश्राम किया जाता है। भारत और नेपाल से आये हुए सन्यासियों और श्रद्धालुओं के भजन-कीर्तन आदि से पूरे पंद्रह दिनों तक दिवारात्रौ बस ईश्वर अनुराग की ध्वजा लहराती रहती है। श्री किशोरी जी और श्री दुल्हा जी के नाम का जय जय घोष, सम्पूर्ण मिथिला को पावन कर देता है।तत्पश्चात जब यह डोला जनकपुर पहुँचता है तो वहाँ यह जनकपुर की अंतर्गृही परिक्रमा के साथ जुड़ जाते हैं।

लघु (अंतर्गृही) परिक्रमा :
यह परिक्रमा फागुन पूर्णिमा के दिन की जाती है जिसके अंतर्गत जनकपुर नगर के चारों ओर लगभग आठ किलोमीटर तक भ्रमण किया जाता है और जनकपुर नगरी की प्रदक्षिणा की जाती है। इस परिक्रमा में डोला को घूमने के लिए एक पथ बना हुआ है।

इस परिक्रमा के अंतर्गत कदम्ब चौक हनुमान मंदिर से गंगा सागर में स्नान कर भ्रमण प्रारम्भ करते हैं और इस सर में स्नान करने के बाद सभी भक्त अपने मिथिला बिहारी के डोले के साथ कदम्ब चौक जाते हैं। फिर वहाँ से परिक्रमा पथ के सहारे मुरली चौक होते हुए, ज्ञानकूप, विहार कुंड, पापमोचनी सर आदि की परिक्रमा करते हुए पुनः उसी स्थान पर गंगा सागर के निकट पहुँच जाते हैं।

जहाँ बात नेपाल स्थित मूल श्री जानकी मंदिर की आती है तो, इस स्थल का इस परिक्रमा में बहुत बड़ा स्थान है।अतः आइए इस परिक्रमा के क्रम में मिथिला की इस प्राचीन और प्राकट्य मूल धरोहर की चर्चा भी कर लेते हैं।
श्री जानकी-मंदिर (जनकपुरधाम,नेपाल) श्री जानकी-मंदिर के विस्तार और महल-विन्यास की अलग ही कथा है।

आज के युग में प्रसिद्द ये जानकी मंदिर, जनकपुर ही नहीं सम्पूर्ण मिथिला और नेपाल राष्ट्र के लिए एक गौरव स्तम्भ बन कर उभरा है। इस मंदिर को श्री किशोरीजी का साक्षात् निवास-स्थल माना जाता है। मान्यता के अनुसार इस मंदिर का प्रधान गर्भ-गृह श्री किशोरी जी का कोहबर है और वहाँ नित्य श्री दूल्हा-दुल्हन सरकार विराजते हैं। इस धारणा के पीछे मंदिर के संस्थापक और प्रथम महंत श्री बाबा सूरकिशोर दास जी की एक अद्भुत लीला का विवरण मिलता है।

जैसा कि कथाओं में वर्णित है, एक बार बाबा ने सोचा कि बेटी की ससुराल जा कर उससे मिल आऊँ। ऐसा सोच कर बाबा अयोध्या की ओर प्रस्थान कर गए।भक्त का भाव देख कर श्री किशोरी जी, श्री दुलहा जी के साथ बाबा के दर्शन को गईं और उनसे नगर प्रवेश का निवेदन भी किया।किन्तु बाबा ने करुणा-पूरित शब्दों में मना करते हुए समझाया कि बेटीकी ससुराल में जा कर रहना मर्यादोचित नहीं है।उनके निर्मल वचनों से रीझे हुए श्री दुलहा सरकार ने उनसे कोई वरदान माँगने का निवेदन किया। तब बाबा जी ने हाथ जोड़ कर श्री दुलहा जी से कहा कि हमारे यहाँ बेटी और जमाता को देने की परंपरा है और जमाता से कुछ लिया नहीं जाता। मैं इतना ही चाहता हूँ कि आप मेरी पुत्री के साथ नित्य मुझे दर्शन देते रहें।बाबा के ऐसे सहज और प्रेम अनुरक्त वचन सुन कर श्री किशोरी जी ने उन्हें वचन दिया कि वो नित्य श्री दुलहा के साथ जनकपुर स्थित कोहबर में स्थापित मूर्ति में ही विराजमान रहेंगी।

इस कथा को सुन कर केवल मिथिला ही नहीं विश्व के कोने-कोने से भक्त और श्रद्धालु दर्शन औरकामना पूर्ति हेतु मंदिर पधारने लगे। इसी क्रम में वर्तमान वृहत महल की स्थापना का श्रेय टीकमगढ़ (भारत) की तत्कालीन महारानी वृषभानकुअँरि जी को जाता है। कथा के अनुसार महारानी ने पुत्र प्राप्ति की कामना हेतु “श्री कनक-भवन” (अयोध्या, भारत) का पुनर्निर्माण करवाया था। किन्तु तब भी उन्हें पुत्र-रत्न की प्राप्ति नहीं हुई।तब श्री गुरु महाराज की आज्ञा पर उन्होंने 1895 ईस्वी के आस-पास श्री जानकी मंदिर के निर्माण की नींव ली जिसके लिए नौ लाख रुपयों का संकल्प लिया गया। इसलिए इस मंदिर को नौलखा मंदिर भी कहते हैं। हालाँकि इसके विन्यास और विस्तार को सिद्ध करने हेतु निर्माण में संकल्प से कहीं अधिक प्रयास किया गया और लगभग बारह वर्षों के कठिन श्रम के बाद मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण हुआ। संकल्प के एक वर्ष के पश्चात ही महारानी जी को पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई किन्तु उनके जीवन काल में ये मंदिर संपन्न नहीं हो पाया और इसको पूर्ण करने का दायित्व उनकी छोटी बहन श्री नरेंद्र कुमारी ने पूर्ण किया। गर्भगृह के निर्माण के पश्चात मूर्ति की स्थापना लगभग 1911 ईस्वीमें कर दी गई थी।

श्री किशोरी जी को समर्पित यह मंदिर जनकपुरमुख्य बाजार के उत्तर-पश्चिम में अवस्थित है। यह मंदिर हिन्दू-राजपूत नेपाली शिल्पकला का एक अच्छा मिश्रण है और इसमें प्रयुक्त स्थापत्य-कला मुग़ल शैली की है। जैसा की विवरण है यह मंदिर एक व्यापक महल और राज-दरबार की भांति विशाल और विराट स्वरूप में निर्मित किया गया है।मंदिर का निर्माण बड़ा रोचक है जिसमें बीच में मंदिर के गर्भगृह का भवन है और उसके चारों और विशाल दीवारों से घिरे भवनों की एक श्रृंखला है जिसके दो मुख्य द्वार हैं।

मंदिर के चारों कोनों पर बने स्तम्भ एकदम एक जैसे हैं जो स्थापत्य कला का एक अलग ही नमूना है।यह एक तीन-मंजिले महल के रूप में विक्सित किया गया है जिसमें सफेद पत्थर और संगमरमर का प्रयोग किया गया है और मंदिर का यथा संभव बाह्य रंग भी सफेद ही रखा गया है जिसमें जो शांति और समृद्धि को दर्शाता है। पुनः साज सज्जा और भव्यता बनाए रखने के लिए केसरिया, पीला , हरा और नीला रंग भी प्रयुक्त हुआ है जो मुंडेरों और मेहराबों को भव्य और आकर्षक बनाता है। साथ ही भांति-भांति की चित्रकला और नक्काशी भी दिखाई देती है जो श्री किशोरी जी के ऐश्वर्या का प्रतीक है। मंदिर की ऊंचाई लगभग 70-75 मीटर की है और इसका क्षेत्रफल लगभग 4860 वर्गफीट का है।

मंदिर में गर्भगृह के अतिरिक्त लगभग साठ कमरे हैं जिन्हें बहुत सुन्दर और कलात्मक ढंग से सुसज्जित किया गया है। इनमें रंग-बिरंगे काँच, भव्य स्थायी जालीदार पर्दे और जालीदार खिड़कियों का प्रयोग किया गया है।जानकी मंदिर प्रांगण में प्रवेश के लिए तीन विशाल द्वार हैं जो क्रमशः पूरब, दक्षिण और उत्तर दिशा से हैं। प्रांगण में घुसाने के पश्चात मंदिर के वाम भाग या पिछले भाग में विवाह मंडप आदि है और मंडप के सन्मुख प्रांगण में एक विशाल फव्वारा भी है जो इसकी सुंदरता को और भी निखरता है। मुख्य मंदिर में प्रवेश हेतु पाँच द्वार हैं जिनमें दो प्रमुख द्वार हैं और तीन छोटे–छोटे द्वार हैं। दोनों प्रमुख द्वार लगभग ३०-३० फीट की ऊंचाई के हैं और द्वार की संरचना और नक्काशी बहुत उत्तम कोटि की है। पहला द्वार जो मंदिर के गर्भगृह के ठीक सामने है वो बहुत विशाल और भव्य है और वही मुख्य प्रवेश द्वार भी है जहाँ से हर दिन हजारों की संख्याँ में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।

किन्तु श्री किशोरी जी का दरबार है ऐसा मानकर उनके निजी सेवक और भक्त गर्भगृह के बाएँ और लगे सिंहद्वार से प्रवेश करना ज्यादा उचित मानते हैं। उस द्वार के ऊपर सिंह की मूर्तियाँ बनी हैं जो द्वार की सुंदरता और भव्यता को चार चाँद लगा देते हैं। ये द्वार पीछे वाला द्वार मना जाता है और यही विवाह मंडप आदि से मंदिर के गर्भगृह को जोड़ता है। इसके अतिरिक्त तीन छोटे -छोटे द्वार हैं जिनमें एक मुख्य गर्भगृह के पीछे अवस्थित जनक-मंदिर के पीछे से है, दूसरा द्वार मंदिर के रसोई-घर के दक्षिण से है और तीसरा द्वार श्री संकीर्तन कुञ्ज के पीछे उत्तर दिशा से है।

श्री कोहबर:(गर्भगृह):
मंदिर में प्रवेश करने के बाद सर्वप्रथम श्री कोहबर (मंदिर के गर्भगृह ) के दर्शन होते हैं जहाँ श्री किशोरी जी, श्री दुलहा जी, श्री लखन लाल और चारों दुल्हा-दुल्हिन सरकार की प्रतिमाएं स्थापित हैं।यह गर्भगृह पूरब दिशा की ओर है।श्री सूरकिशोर बाबा को प्राप्त हुए विग्रह भी यहीं स्थापित हैं। इस झांकी के अन्तः भाग में श्री युगल सरकार के विशेष कोहबर की सेवा की जाती है जो गोपनीय है। ऐसा मना जाता है कि भक्तों को दर्शन देने के बाद प्रभु इसी अन्तः गृह में विश्राम करते हैं। गर्भगृह को कोहबर कहने का एक विशेष कारण है मैथिल संस्कृति, जिसके अंतर्गत किसी नव-विवाहित जोड़े के शयन कक्ष को “कोहबर” कहा जाता है।

मान्यताओं के अनुसार श्री किशोरी जी और श्री रघुनाथजी आज भी नव दुल्हा-दुल्हन के स्वरूप में ही विराजते हैं अतः उनका मंदिर कोहबर नाम से प्रसिद्द है। इस कोहबर में प्रतिष्ठित दरबार की झाँकी को एक निश्चित ऊंचाई पर व्यवस्थित किया गया है जिससे सूर्योदय की किरणें सर्वप्रथम श्री दुल्हा सरकार की सेवा में ही उपस्थित होती हैं।

यहाँ मिथिलावासियों के लिए मंदिर में प्रतिष्ठित विग्रह कोई भगवान् नहीं अपितु उनके बहन-बहनोई हैं। इस मंदिर में प्रार्थना, याचना या मनोकामना नहीं की जाती अपितु अपनी किशोरी जी से विमर्श किये जाते हैं, उनके आदेश लिए जाते हैं, उनका मान किया जाता है।

श्री पाकशाला:
मंदिर में दर्शन के पश्चात ७ बार या चार बार परिक्रमा का विधान है और उसी परिक्रमा के क्रम में बाएं और (मंदिर के दक्षिण में ) श्री किशोरी जी की रसोई है जहाँ नित्य भोग आदि पकाया जाता है और भंडारे हेतु सम्पूर्ण व्यवस्था होती है। किन्तु इस भाग में सामान्य प्रवेश वर्जित है।

श्री जानकी विद्युतीयचलचित्र संग्रहालय :
पाकशाला के बाद दक्षिणी कोण में हाल ही में 2012 ईस्वी में श्री जानकी संग्रहालय बनाया गया है जिसके अंतर्गत मंदिर के प्रारम्भ से लेकर अब तक के इतिहास से सम्बंधितवस्तुएं, चित्र, वस्त्र-आभूषण, श्रृंगार आदि की सामग्रियों और मंदिर के महंत परंपरा के संतों और महंतों से सम्बंधित अभिलेख, चित्रपट और चित्र संकलन आदि लगाए गए हैं। इसके अतिरिक्त रामायण काल की हुई कुछ घटनाओं और संस्कृतियों को दर्शाने के लिए हाईड्रोलिकसिस्टम, ध्वनि और विद्युत् के माध्यम से कई झांकियों का निर्माण किया गया है जो श्री किशोरी जी के जन्म से ले कर विवाह आदि के समस्त घटना-क्रमों का वर्णन करता है। ये भाग भी दर्शनीय और ज्ञान वर्धक है। मंदिर में अंदर ही अंदर सभी भाग आपस में जुड़े हुए हैं और महल की अट्टालिकाएं दर्शनार्थियों का मन अपनी और खींचती हैं।

अन्य -मंदिर :
मंदिर के गर्भगृह के ठीक पीछे जनक महाराजऔर अम्बासुनैनाका मंदिर है जिसमें श्री सूरकिशोर बाबा को प्राप्त हुई शिलाएं, अभिलेख आदि भी स्थापित हैं।जनक मंदिर से पूर्व श्री बाल-हनुमाना जी का मंदिर भी है जहाँ नित्य प्रति उनकी सेवा होती है।ये छोटे-छोटे मंदिर मिथिला की संस्कृति में परिवार परम्परा को भलीभांति दर्शाते हैं।यहाँ मात्र भगवान्ही नहीं अपितु उनका समस्त परिवारनिवास करता है ।

कोठार-गृह:
परिक्रमा के क्रम में आगे कोठार-गृह मिलता है जिसमें मंदिर से सम्बंधित अभिलेख,धर्म-ग्रन्थ से जुड़े अभिलेख, विभिन्न प्रकार के ग्रन्थ आदि की व्यवस्था की गई है।

शालिग्राम-मंदिर :
परिक्रमा के क्रम में मंदिर के उत्तरी भाग में श्री शालिग्राम भगवान का मंदिर भी है जिसमे लगभग सवा लाख (१२५०००) शालिग्राम स्थापित हैं और उनकी नित्य पूजा-अर्चना की जाती है।

अखंड नाम-संकीर्तन स्थली :
पाठ्यक्रम करते हुए मुख मंदिर के उत्तरी भाग में श्री सीताराम नाम का अखंड संकीर्तन स्थल है जहाँ लगभग 1961 ईस्वी से अखंड श्री सीताराम नाम संकीर्तन चल रहा है। ये स्थल भी दर्शनीय है।

इस प्रकार परिक्रमा के पश्चात मंदिर से नीचे उतरते ही उत्तर की और पीछे वाले द्वार से सटे हुए भाग में श्री जनक-परंपरा के तत्कालीन विदेह महाराज का निवास स्थल है जहाँ से वह मंदिर और उसकी व्यवस्था का संचालन करते हैं।

विवाह मंडप -फुलवारी :
जानकी मंदिर के पिछले हिस्से मेंपश्चिमोत्तर कोण में एक बहुत ही सुन्दर उद्यान है जिसे फुलवारी कहते हैं। इस फुलवारी के मध्य में एक विशाल मंडप है जो नवीन विवाह मंडप के नाम से प्रसिद्द है। मान्यता के अनुसार इस स्थल पर श्री किशोरी जी और श्री दुल्हा जी का विवाह संपन्न हुआ था। इस मंडप के मध्य में श्री किशोरी जी -दुल्हा जी की प्रतिमा हैं जो गणपति-स्थापना के संग विवाह-वेदी पर बैठी हैं और उनके दोनों और चारुशीला और चन्द्रकला सखियों की प्रतिमाएं हैं।

श्री किशोरी जी की तरफ वेदी के एक ओर श्री जनक जी, अम्बासुनैना, महाराज श्रुतिकीरत और गुरुदेव शतानन्द आदि हैं तो वहीँ दुल्हा जी की तरफ वेदी के दूसरे ओर श्री दशरथ जी , वशिष्ठ जी, विश्वामित्र जी आदि विराजमान हैं। पीछे श्री किशोरी जी के भाई-भावज श्री लक्ष्मीनिधि जी और श्री निधि जी खड़े हैं।इसमंडप का निर्माण नेपाल की पैगोडा शैली में किया गया है और इसके अंदर सभी स्तम्भों पर विवाह में उपस्थित देवताओं आदि की मूर्तियां बनाई गई हैं ।

इस मंडप में स्थापित सभी मूर्तियों की संख्याँलगभग108 हैं। इसे चारों ओर से काँच की दीवार से घेर दिया गया है जिसके कारण इसे शीश-महल भी कहते हैं। इस मंडप के चारों कोनों पर चारों दुल्हा-दुल्हिन सरकार की युगल मूर्तियां स्थापित हैं जिनमें बायीं ओर से श्री राम-जानकी कोहबर, फिर अगले कोने पर श्री भरत-मांडवीकोहबर, तीसरे कोने पर श्री लक्ष्मण-उर्मिलाकोहबर और चौथे कोने पर श्री शत्रुघ्न-श्रुतिकीर्तिकोहबर विराजमान हैं।

मंडप से उतारकर फुलवारी के दूसरे भाग में जनक -परंपरा के कुछ प्रसिद्द महंतों की मूर्तियां स्थापित हैं जो उद्द्यान की शोभा को और भी बढ़ा देती हैं।

श्री लक्ष्मण-मंदिर:
मंदिर के बाह्य परिसर में श्री लखन-लाल जी का मंदिर है जो नेपाल महाराज द्वारा बनवाया गया है। मान्यता अनुसार ये श्री जानकी मंदिर से भी पुरानाहै।

इन सबके अतिरिक्त श्री जानकी मंदिर के कण-कण में विराजने वाली सौम्यता और दिव्यता को वर्णन करने से नहीं समझा जा सकता इसके लिए तो दर्शन करना ही उत्तम मार्ग है।

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