सौराठ: मिथिला का एक सांस्कृतिक स्थल

November 16, 2022 इतिहास रिपुंजय कुमार ठाकुर
सौराठ: मिथिला का एक सांस्कृतिक स्थल

सौराठ मिथिला(उत्तर बिहार) के मधुबनी जिले में स्थित एक ऐतिहासिक-सांस्कृतिक गाँव है। यह मिथिला के उन गांवों में से एक है, जो मिथिला के सांस्कृतिक इतिहास में अपने विशाल योगदान के लिए जाना जाता है। यह एक प्राचीन स्थान है, जहाँ खुदाई किये गए कुछ टीले पाए गए हैं, जो संभवतः इसके ऐतिहासिक महत्व की अपार जानकारी को अपने गर्भ में गोपन किया हुआ है। ब्रिटिश- भारत सरकार के पुरातत्व सर्वेक्षक अलेक्जेंडर कनिंघम ने उन्नीसवीं सदी के आठवें दशक में इस गांव का सर्वेक्षण ओईनवार वंशीय राजा शिव सिंह के एक अभिलेख की एक छाप या फोटोग्राफी लेने के लिए किया , जो 14 वीं सदी से संबंधित है, प्रकृतः यह एक दान अभिलेख है जो राजा ने विद्यापति को प्रदान किया था।

इस ताम्रपत्र अभिलेख की जानकारी उनके साथ दरभंगा के बाबू लाल नामक एक स्थानीय पंडित ने साझा की थी।

कनिंघम लिखते हैं कि पंडित बहुत बुद्धिमान और विद्वान था, और उन्हीं से सौराठ के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई थी। 1880-81 ई. में अपनी पुरात्त्विक सर्वेक्षण यात्रा के बाद उन्होंने इस प्राचीन ग्राम की प्रशंसा में निम्नलिखित लिखा है: “इस ब्राह्मणवादी गाँव की एंटिक्विटी पर थोड़ा संदेह हो सकता है, और यद्यपि मूल ताम्रपत्र अभिलेख से किसी तरह का स्टाम्प या संस्करण हासिल न करने पर गंभीरता से निराश होना पड़ा, मुझे सौराठ जाने का दुख नहीं है । ”

कनिंघम ने उल्लेख किया है कि यह अभिलेख नान्हू ठाकुर के कब्जे में था और उन्होंने लगभग 20 साल पहले सरकार को यह ताम्रपत्र अभिलेख प्रस्तुत किया था। अन्य गाँव के पंडितों के साथ ठाकुर ने अधिक जानकारी एकत्र करने में उनकी मदद की। उस समय कनिंघम सौराठ में दो डीह को देख सकते थे, जो लगभग एक मील पर अलग था। उस सतह पर कोई पुरातात्विक अवशेष नहीं खोज सका, इसलिए खुदाई की स्थल तय करना मुश्किल था। प्रख्यात सर्वेक्षक लिखते हैं कि ग्रामीण उन टीलों अथवा अवशेषों को प्राचीन नगर या बस्ती का अवशेष मानते हैं और वें उन लोगों के विचार से सहमत भी हैं। उन्होंने बड़े डीह में कुछ सतही खुदाई की जिसमें कुछ ईंटें और मिट्टी की कई गेंदें जिसके केंद्र में छिद्र मिलीं, संभवतः जिसका प्रयोग कताई (spinning weights) के लिए किया जाता था।

इस गाँव का मूल संस्कृत नाम “सौराष्ट्र” है। लोक दर्शन अथवा परंपरा में इस नाम की उत्पत्ति दो प्रकारों से वर्णित है। पहली दंत कथा(anecdote) बताती है कि यह गाँव रामायण काल से पहले का है और रामायण काल में यह सौ छोटे देशों के समूह का मुख्यालय था। हालांकि यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि रामायण की कुछ घटनाएं सौराठ गाँव के आसपास के कुछ स्थानों से भी जुड़ी हुई हैं, जैसे सतालखा, मंगरौनी और कनैल। इस जनश्रुति के आधार पर स्थानीय इतिहासकार इज़हार अहमद ने ग्राम जगतपुर की पहचान की है जो सौराठ के पूर्व में मिथिलापुरी, विदेह साम्राज्य की राजधानी के रूप में स्थित है। यह वहीं स्थल है जहाँ पर राजा जनक की सभा में वाद-विवाद/शास्त्रार्थ में याज्ञवल्क्य ने कई विद्वानों को पराजित किए थे। इस क्षेत्र में टीलों की खुदाई से रामायण की कलाकृतियों तथा रामायणकालीन संस्कृति की पुरातत्विक साक्ष्य को खोजने की संभावना है, जो भविष्य में मिथिला के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को एक नया दृष्टि प्रदान कर सकता है।

सौराष्ट्र/ सौराठ के नामकरण से संबंधित दूसरे उपाख्यान के अनुसार जब 1025 ईस्वी में महमूद गजनी ने गुजरात राज्य अंतर्गत सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर का लूट पाट किया और ज्योतिर्लिंग को तोड़ा तब सौराठ ग्राम के दो ब्राह्मण भाई भागीरतदत्त और गंगादत्त को भगवान् आशुतोष का स्वप्न आया और महादेव ने उन्हें ज्योतिर्लिंग को कहीं और सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराने के लिए कहा और वे शिवलिंग को इस गांव में ले आए। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि जब राजा हरिसिंहदेव ने चौदहवीं शताब्दी ई. (1309-24) के पहले चरण में मैथिल ब्राह्मणों और कर्ण कायस्थों का पंजीकरण(genealogical accounts of the region maintained by hereditary record keepers) शुरू किया था, उस समय सौराठ नाम की कोई उत्पत्ति या मूल नाम की कोई शाखा नहीं थी। इससे पता चलता है की उस समय गांव में ब्राह्मणों और कायस्थों का निवास नहीं था।

सभा गाछी में पंजीकार और उनके पंजी दस्तावेज

सौराठ मैथिल ब्राह्मणों के वैवाहिक मिलन केंद्र के लिए प्रसिद्ध रहा है, जिसे लोकप्रिय रूप में सौराठ सभा के रूप में जाना जाता है। सभा-गाछी विवाह मिथिला के सामाजिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू है जो देश में कहीं भी समानांतर नहीं है। सांस्कृतिक गांव सौराठ में सभा की संस्था ने पूर्व -आधुनिक मिथिला में संवेग प्राप्त किया। राज्य एवं स्थानीय लोगों की देख रेख में प्रतिवर्ष सौराठ सभा का आयोजन इस गांव के बाहरी इलाके से गुजरने वालीं जयनगर- मधुबनी मार्ग के निकट स्थित सभागाछी में आयोजित किया जाता था। जिस स्थान पर लोग इकट्ठा होते थे वह स्थल तपती सूरज से सुरक्षा प्रदान करने वाले पीपल, बरगद, पाकुड़ और आम आदि के पेड़ों से घिरा हुआ था (अभी भी सभा स्थल पेड़ों से घिरा हुआ है), जिन्हें मैथिली में सभा गाछी कहा जाता है। बीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में इस वैवाहिक सभा की प्रासंगिकता वैश्वीकरण की सांस्कृतिक अस्त्र पश्चिमीकरण के आगमन के साथ घटती गई और यह घटना व्यावहारिक उपयोग से बदलकर सामाजिक परंपरा की सांस्कृतिक वर्षगांठ के रूप में बदल गई है।

सभा गाछी में हजारों लोगों की उपस्थिति स्रोत: इंडिया टुडे/गूगल

यह सभा हिंदू कैलेंडर के ज्येष्ठ-आषाढ़ महीनों में आयोजित होने वाला एक वार्षिक कार्यक्रम था। ऐसा कहा जाता है की लाखों लोग यहाँ आते थे। वर और वधु दोनों पक्ष घटक, पंजीकार, रिश्तेदार या परिचितों के साथ इस मिलन सभा में एकत्रित होते थे। हालांकि यह एक खुला वैवाहिक आयोजन था लेकिन जाति/वर्ण की स्थिति को बनाए रखा गया था। इस सभा को आयोजित करने का आदेश स्थानीय खंडवाल राजाओं ने पंजीकारों को दिया था और उन्होंने इसका सफलतापूर्वक आयोजन और संचालन किया। सौराठ सभा में विभिन्न गाँवों के रजिस्ट्रार / पंजीकार अपनी-अपनी पंजी प्रबंधों के साथ बैठते थे। धीरे-धीरे कई प्रसिद्ध पंजीकार / वंशावली परिवारों ने गाँव में बसने का फैसला किया और उनमें से कुछ अभी भी वहाँ हैं। सौराठ सभा की उत्पत्ति से पहले इस तरह की बैठकें समौल और अक्सर पिलखवाड़ (दोनों मधुबनी जिले में स्थित ग्राम हैं) में होती थीं। किसी समय, इस तरह की बैठकें मिथिला के विभिन्न क्षेत्रों में चौदह स्थानों पर होती थी जिनमें सौराठ और समौल प्रमुखता से शामिल हैं।

महामहोपाध्याय परमेश्वर झा के अनुसार, खंडवाला राजा राघव सिंह(1703- 1739 ई.) ने समौल गांव के पास सभा का आयोजन शुरू किया। सभा में पंजिकार दोनों पक्षों के मध्य विवाह ठीक हो जाने पर ताड़-पत्र पर लिखकर सिद्धांत पत्र देते थे। सिद्धांत पत्र विवाह के लिए स्वीकृति होती है जो यह जाँचने के बाद जारी किया जाता था (अभी भी कुछ लोग विवाह की इस पारंपरिक-साइंटिफिक पद्दति के द्वारा विवाह करते हैं) की सात पीढ़ियों से वर-वधू पक्ष के बीच कोई खून- सम्बन्ध(blood-relation) नहीं था।

परमेश्वर झा लिखते हैं कि समौल में सभा के लिए नियुक्त रजिस्ट्रार/पंजीकार पर किसी कारणवश ग्रामीणों द्वारा एक बार अत्याचार किया गया था और उन्होंने उस गाँव से पलायन करने का फैसला किया और अंततः सौराठ में बस गए, जहाँ पंजीकारों ने सभा / सभा का गंतव्य चुनने के लिए तरौनी (दरभंगा जिला) के होराइ झा की सहायता प्राप्त की। राजा माधव सिंह ने इस सभा में शामिल होने के लिए बाहर से आने वाले लोगों की सुविधा के लिए एक सभागृह, मंदिर(माधवेश्वर शिवालय), मंदिर के चारों दिशा में विशाल धर्मशाला और मंदिर के इशान कोण में एक बड़ा पोखर का निर्माण शुरू किया।

छत्र सिंह के समय में निर्माण कार्य 1832-33 ई. में पूरा हुआ। निर्माण कार्य से सम्बंधित उपरोक्त वृत्तांत माधवेश्वर मंदिर के कीर्तिशिला में उल्लेखित है। दुर्भाग्य से अभिलेख का दूसरा भाग अब स्पष्ट दिखाई नहीं देता है, इसको पुरातत्विक ढंग से साफ करके पढने की आवश्यकता है। कीर्तिशिलालेख का प्रथम भाग इस प्रकार है:

अभिलेख माधवेश्वर मंदिर के गर्भगृह के बाहर वाले दीवार पर अंकित है। फोटो साभार: लेखक स्वयं

इस प्रकार सौराठ मिथिला की एक सांस्कृतिक-ऐतिहासिक स्थल है। सोमनाथ मंदिर सहित गाँव में कई मंदिर हैं जो एक आधुनिक वास्तुकला के साथ विराजमान हैं जहाँ लोग बड़ी आस्था के साथ पूजा करने जाते हैं। जैसा की पूर्व उल्लेखित है मिथिला के शासक द्वारा निर्मित सभागाछी में माधवेश्वर मंदिर नाम का एक बड़ा शिव मंदिर है। मंदिर का परिसर हरा-भरा है, जिसके आंगन में श्रदालु-आश्रय के लिए एक इमारत है, जिसके निकट ही एक बड़ा पोखर है और पक्का घाट बना हुआ है। अब इस स्थल का रखरखाव नहीं किया जाता है, कोई भी इसकी दयनीय स्थिति को देखते हुए इस पोखर में स्नान नहीं करना चाहता है।

कुछ पंजीकार अभी भी सक्रिय हैं, उनका घर भी सभा गाछी के परिसर में ही है। वें वहां नित्य अपने सम्पत्ति/विरासत पंजी-प्रबंध के साथ बैठते हैं और समुदाय के सदस्यों के लंबे वंशावली इतिहास को बनाए रखते हैं। हाल ही में सौराठ सभा गाछी के निकट मिथिला लोक कला केंद्र तथा मिथिला संग्रहालय की स्थापना हुई है। सौराठ ग्राम में विभिन्न जाति/वर्ण के लोग रहते हैं, आर्थिक एवं शैक्षिक रूप से गाँव समृद्ध है। गाँव के कई महिलाओं ने मिथिला पेंटिंग में अपना नाम कमाया है।

माधवेश्वर शिवालय, सभा गाछी फोटो साभार: लेखक स्वयं


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अनुवादक :
मोहिनी किशोर
कला इतिहास विभाग
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय
(प्रस्तुत आलेख के मूल स्वरूप की भाषा अंग्रेजी है जो पुस्तक मड़बा में प्रकाशित है।)

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